Panchatantra Stories for Kids in Hindi

Enjoy listening to popular Panchatantra stories for kids

panchatantra stories for kids in hindi

Popular Panchatantra Stories for Kids in Hindi

These Panchatantra Stories for Kids in Hindi are wise old Hindi moral stories for kids, also popularly known as ‘Panchtantra ki Kahaniyan’ are our take on the classic old traditional stories which have been part of Indian culture for centuries.

These Panchtantra stories  use animals as protagonists who play lead characters in the stories. The purpose is not just to entertain the kids but also to help them understand the basics of life and teach them important life lessons on morality and empathy. In other words, the Panchatantra Stories for Kids in Hindi comes with a great mix of entertainment and learning making each story a great hit with the young ones.

What are Panchatantra stories for kids?

Panchatantra Stories for Kids in Hindi are an ancient collection of animal fables. Panchatantra is divided into Five (Panch) core Teachings (Tantras) with each part having a frame story with other stories interwoven within it. These five parts are – Loss of Friend (Mitra bhed), Winning of Friends (Mitra Labh), On Crows and Owls (Kākolūkīyam), Loss of Gains (Labdhapraṇāśam), and Ill Considered Actions (Aparīkṣitakārakaṃ).

All Panchatantra Stories for Kids in Hindi have animals as lead characters with human virtues and vices. These moral stories have been adapted in every major Indian language.  

All  Panchatantra Stories for Kids in Hindi is available on the Free Chimes Radio mobile apps – in Google and Apple App stores.

Who wrote Panchatantra stories for kids?

Panchatantra stories for kids was written originally in the Sanskrit language around 200-300 BC. These tales are attributed to Pandit Vishnu Sharma who was tasked by King Amarasakti of Mahilaropyam in the south of India to impart knowledge and wisdom to his three princes. So Pandit Vishnu Sharma used these moral stories which have been passed on from generations to enlighten the princes within a period of six months. 

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Table of Contents

13 Popular Panchatantra Stories for Kids in Hindi

Mentioned below are the popular Panchatantra Stories for kids in Hindi

1. The Fall and Rise of a Merchant (व्यापारी का पतन और उदय)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

बहुत  समय पहले की बात है। वर्धमान नाम के एक शहर में एक बहुत ही समझदार व्यापारी रहता था। जब राजा को उसके गुणों के बारे में  पता लगा तो राजा ने  उसे राज्य का सारा काम सौंप दिया। अपनी सूझ-बुझ से वर्धमान ने आम आदमी को भी खुश रखा और  दूसरी तरफ राजा को भी बहुत प्रभावित किया।

कुछ दिनों बाद व्यापारी की बेटी की शादी थी।   इस ख़ुशी में उसने बहुत बड़े भोजन का आयोजन किया। भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा, सभी को न्योता दिया। आये हुए मेहमानो को उसने बहुत सम्मान दिया और सभी मेहमानों को कीमती उपहार भी दिए।

सब मेहमानों में से एक मेहमान राजघराने का सेवक भी था। वह महल में राजा के कमरे में झाड़ू लगाता था और राजा का बहुत पुराणा नौकर था। पर गलती से वह नौकर एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो राज परिवार के लिए रखी गयी  थी।  यह देखकर व्यापारी को बहुत गुस्सा आया  और उसने सेवक को  धक्के देकर बाहर निकल दिया।सेवक को बहुत बुरा लगा  और उसने व्यापारी को सबक सिखाने का मन बना लिया ।

कुछ दिनों बाद वही सेवक राजा के महल में झाड़ू लगा रहा था । वह आधी नींद में सो रहे राजा को देख कर बोलने लगा “इस व्यापारी की यह मजाल की वह रानी जी के साथ ऊँची आवाज़ में बात करे?”

यह सुनकर राजा अपने बिस्तर से उठा और उसने सेवक  से पूछा, “यह तुम क्या बोल रहे हो? क्या यह सच है? तुमने व्यापारी को रानी से ऊंची आवाज़ में बात करते हुए देखा था क्या ?”

सेवक ने तुरंत राजा के चरण पकडे और बोला: “मुझे माफ़ कर दीजिये महराज , मैं पूरी रात जागता रहा और बिलकुल  सो न सका।  इसीलिए नींद में कुछ भी बोल  रहा हूँ।”

राजा ने उससे कुछ नहीं बोला पर वह मन ही मन सोचने लगा की कही यह बात सच तो नहीं।  उसी दिन से राजा ने व्यापारी के महल में आने जाने पर रोक लगा दी  और उसके अधिकार भी कम कर दिए। अगले दिन जब व्यापारी महल में आया तो उसे सैनिकों ने अंदर जाने से रोक दिया। यह देखकर व्यापारी बहुत हैरान हुआ।

तभी वहीँ खड़े सेवक ने मज़ाक बनाते हुए कहा “सैनिकों, ज़ारा अदब से बात करो इनसे। तुम जानते नहीं ये कौन हैं ? ये राजा के ख़ास  हैं और बहुत शक्तिशाली भी। यह तुम्हें एक मिनट में बहार फिकवा सकते हैं, जैसा इन्होने मेरे साथ अपनी बेटी की शादी में किया था।“

यह सुनते  ही व्यापारी को सारी बात समझ में आ गयी।

फिर कुछ दिन बाद व्यापारी ने सेवक को बड़े आदर सत्कार के साथ अपने घर दुबारा बुलाया, उसकी खूब सेवा करी और तोहफे भी दिए।  फिर उसने बड़े प्यार से भोज वाले दिन के लिए माफ़ी भी मांगी।

सेवक इस आव भाव से बहुत खुश था और उसने कहा “ न केवल आपने मुझसे माफ़ी मांगी, पर मुझे इतना सम्मान भी दिया। आप चिंता न करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाउंगा।“

अगले दिन वह फिर नींद में सो रहे  राजा को देख कर बोला “ हे भगवान, हमारा राजा तो ऐसा मूर्ख है की वह पुराणा बासी खाना भी खा जाता है ”

यह सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया और बोला – “मूर्ख सेवक, तुम्हारी ऐसी बोलने की हिम्मत कैसे हुई? तुम अगर मेरे महल के पुराने वफादार न होते तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।”

सेवक ने दोबारा पैरों में गिर कर मांफी मांगी और दोबारा कभी ऐसा न बोलने की कसम खायी ।

राजा भी सोचने लग गया कि जब यह मेरे बारे में ऐसे बोल सकता है तो  ज़रूर  ही इसने व्यापारी के बारे में भी गलत बोला होगा, जिसकी वजह से मैंने उसे बेकार में सज़ा दे दी।

अगले दिन ही राजा ने व्यापारी को महल में उसका खोया सम्मान  वापस लौटा दिया ।

 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का  पाठ पढ़ाती हैं  और इस कहानी से हमे २ बातें सीखने को मिलती हैं । 

पहली ये कि हमें हर किसी के साथ सद्भाव और समान भाव से ही पेश आना चाहिए, चाहे वह व्यक्ति  बड़ा हो या छोटा। हमेशा याद रखें, जैसा व्यव्हार आप खुद के साथ होना पसंद करेंगे वैसा ही व्यव्हार दूसरों के साथ भी करें । 

दूसरी ये कि हमें सुनी सुनाई बातों  पर यकीन नहीं करना चाहिए बल्कि किसी बात का शक होने पर, अच्छी तरह जाँच पड़ताल करके ही निर्णय लेना चाहिए।

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2. The Lion and the Clever Hare (शेर और चतुर खरगोश)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक जंगल में एक बहुत ताकतवर शेर रहता था। जब भी वह शिकार पर निकलता, तो अपनी मस्ती में वह कई कई जानवरों का शिकार कर डालता और अपने शिकार को बिना खाये ही छोड़ देता।

सारे जंगल में सनसनी फैल गई और सारे जानवर डरने लगे कि अगर शेर इसी तरह से शेर शिकार करता रहा तो जल्द ही जंगल के सभी जानवरों का सफाया हो जायेगा।

शेर को रोकना अब अनिवार्य लगने लगा था।  यही सोच कर एक दिन जंगल के सभी जानवर इकट्ठा हुए और इस पर विचार करने लगे।अन्त में उन्होंने तय किया कि वे सब शेर के पास जाकर इस बारे में बात करनी ही पड़ेगी।

अगले ही दिन जानवरों का एक दल शेर के पास पहुंचा। उनको अपनी ओर आते देख शेर ने गरजकर उनसे वहां आने का कारण पूछा। 

जानवरों के नेता ने डरते हुए कहा, ‘‘महाराज, हम आपके पास निवेदन करने आये हैं। आप हमारे राजा हैं और आपका हम पर हक़ बनता है। पर आप हर रोज़ कितने ही जानवरों का शिकार कर डालते हैं। इस तरह तो कुछ ही दिंनो में जंगल से सब जानवर लुप्त हो जायेंगे।  इसीलिए हम आपसे विनती करने आये हैं कि आप अपने घर से शिकार को ना निकलें। हम हर रोज आपने आप ही आपके खाने के लिए एक जानवर भेज दिया करेंगे। इस तरह से आपकी भूख भी शांत रहेगी और जंगल भी बचा रहेगा।“

शेर को लगा कि जानवरों की बात भी सही है। उसने पल भर सोचा, फिर बोला “ठीक है, मैं तुम्हारी विनती को मान लेता हूं पर अगर किसी भी दिन तुम ने मेरे खाने के लिये पूरा भोजन नहीं भेजा तो मैं तुम में से किसी को भी नहीं छोडूंगा। ”

जानवरों ने शेर की शर्त मान ली और वापिस अपने घर लौट आये।

उस दिन से हर रोज शेर के खाने के लिये एक जानवर भेजा जाने लगा। इसके लिये हर रोज जंगल में रहने वाले सब जानवरों में से एक-एक जानवर चुना जाता।

एक एक कर सब जानवरों की बारी आती रही और फिर एक दिन खरगोशों का भी दिन आया। शेर के भोजन के लिये एक छोटे से खरगोश को चुना गया। वह खरगोश जितना छोटा था, उतना ही चतुर भी। उसने मन ही मन सोचा, ” शेर के हाथों ऐसे मरने का क्या फायदा होगा? कोई उपाय सोचा जाये जिससे जान भी बच जाये और हमेशा के लिए शेर से पुरे जंगल को इस शेर से छुटकारा भी  मिल जाये।”

आखिर उस खरगोश ने एक तरकीब सोच ही निकाली। अगले दिन वह आराम से शेर के घर की ओर चल पड़ा। जब वह शेर के पास पहुंचा तो बहुत देर हो चुकी थी। भूख के मारे शेर इधर उधर करवटें बदल रहा था ।

जब उसने सिर्फ एक छोटे से खरगोश को अपनी ओर आते देखा तो गुस्से से गरजकर बोला, ‘‘तुम जानवरों की इतनी हिम्मत की एक छोटे से खरगोश को मेरी भूख मिटने के लिए भेजा है? ऊपर से तुम आये भी इतनी देरी सो हो।  लगता हैं तुम सबको सबक सीखने का समय आ ही गया है।’’

नन्हे खरगोश ने शेर को झुककर कहा, ‘‘महाराज, अगर आप कृपा करके मेरी बात सुन लें तो मुझे या और जानवरों पर गुस्सा नहीं करेंगे। हम जानते थे कि एक छोटा सा खरगोश आपके भोजन के लिए पर्याप्त नहीं रहेगा, इसीलिए आपने भोजन के लिए छह खरगोश भेजे गए थे।लेकिन रास्ते में हमें एक और शेर मिल गया और उसने पांच खरगोशों को मार कर खा लिया।’’

यह सुनते ही शेर दहाड़कर बोला, ‘‘क्या कहा, मेरे जंगल में दूसरा शेर ? कौन है वो? कहाँ देखा तुमने उसे?’’

‘‘महाराज, वह बहुत बड़ा शेर है’’, खरगोश ने कहा, ‘‘और ज़मीन के अन्दर बनी एक बड़ी सी गुफा से रहता है।  वह तो मुझे भी  मारने जा रहा था पर मैंने उससे कहा, ‘सरकार, आपको पता नहीं कि आपने कितना बड़ा अनर्थ कर दिया है।  हम सब इस जंगल के महाराज के भोजन के लिये जा रहे थे, लेकिन आपने उनका सारा खाना खा लिया। हमारे महाराज जब यह बात जानेंगे तो बहुत गुस्सा होंगे और यहाँ आकर आपको मार डालेंगे।”

‘‘तो इस पर दूसरे शेर ने पूछा, ‘कौन है तुम्हारा राजा?’

मैंने जवाब दिया, ‘हमारा राजा जंगल का सबसे बड़ा शेर है।’

‘‘महाराज, मेरे ऐसा कहते ही वह गुस्से से बोला ‘आज से इस जंगल का राजा सिर्फ मैं हूं। यहां के सब जानवर मेरी प्रजा हैं। मैं उनके साथ जैसा चाहूं वैसा कर सकता हूं। जिसमें ताकत हो, वह मेरे सामने आ कर मुझसे युद्ध करे।”

महाराज यह सुनकर में बहुत मुश्किल से जान बचा कर आपको सारी बात बताने के लिए यहाँ आया हूँ।’’

खरगोश की बात सुनकर शेर को बड़ा गुस्सा आया और वह बार-बार गरजने लगा। उसकी भयानक गरज से सारा जंगल हिलने लगा। ‘‘मुझे जल्दी से उस दूसरे शेर के पास ले चलो, लगता है आज मुझे शेर का ही शिकार करना होगा”, शेर ने दहाड़ कर कहा, ‘‘जब तक मैं उसे सबक ना सीखा दूँ , मुझे चैन नहीं मिलेगा।’’

यह सुनते ही खरगोश ने आगे चलना शुरू कर दिया। खरगोश रास्ता दिखाते हुआ शेर को एक कुएँ के पास ले गया और बोला, ‘‘महाराज, वह दुष्ट शेर ज़मीन के नीचे बानी एक गुफा में रहता है। पर आप जरा सावधान रहियेगा।’’

‘‘तुम घबराओ नहीं, मैं उसे अभी सीधा कर देता हूँ’’ शेर ने कहा, ‘‘बस तुम यह बताओ कि वह है कहाँ ?’’

‘‘पहले जब मैंने उसे देखा था तब तो वह यहीं बाहर खड़ा था। लगता है आपको आता देखकर वह अपनी गुफा में घुस गया हो’’

खरगोश ने कुएं के नजदीक जाकर शेर से अन्दर झांकने के लिये कहा। शेर ने कुएं के अन्दर झांका तो उसे कुएं के पानी में अपनी परछाईं दिखाई दी।

परछाईं को देखकर शेर ज़ोर से दहाड़ा। कुएं के अन्दर से आती हुई अपने ही दहाड़ने की गूंज सुनकर उसने समझा कि दूसरा शेर भी दहाड़ रहा है। दुश्मन से तुरंत लड़ने के इरादे से वह कुएं में कूद पड़ा और डूब गया। 

इस तरह चतुराई से शेर से छुट्टी पाकर नन्हा खरगोश घर लौटा। उसने जंगल के जानवरों को शेर के डूबने की कहानी सुनाई। दुश्मन के मारे जाने की खबर से सारे जंगल में खुशी फैल गई और जंगल के सभी जानवर खरगोश की जय-जयकार करने लगे।

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन  को सही तरीके से जीने का पाठ पढ़ाती हैं.

ये कहानी भी हमें सिखाती है कि घोर संकट में भी हमें सूझबूझ और चतुराई के साथ काम लेना चाहिए और आखिरी दम तक प्रयास करते रहना चाहिए।  जिस तरह खतरे में होते हुए भी खरगोश ने चतुराई से काम लेकर शेर जैसे खतरनाक और उससे कहीं अधिक बलशाली शत्रु को पराजित कर दिया, ठीक उसी तरह सूझबूझ और चतुराई से काम लेकर हम भी बड़े से बड़े संकट से बहार निकल सकते हैं।

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3. The Story of Blue Jackal (नीले सियार की कहानी)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है, एक घने जंगल में  सियार रहता था। एक दिन बहुत तेज़ हवा चली और एक पेड़ गिर गया जिसकी चपेट में सियार भी आ गया। वह बुरी तरह घायल हो गया और किसी तरह घिसटता-घिसटता अपनी गुफा  तक पहुंचा। कई दिन वह गुफा में ही रहा पर जब भूख सताने लगी तो वह बाहर आया। उसका शरीर कमज़ोर हो गया था।  सबसे पहले वह एक खरगोश को पकड़ने के लिए भागा, पर कुछ दूर भागने के बाद ही वह बुरी तरह से हांफने लगा।

फिर उसने एक चिड़िया का पीछा करने की कोशिश की पर यहां भी वह असफल रहा।  हिरण का पीछा करने की तो उसने सोची तक नहीं। 

तब वह सोचने लगा की अगर वह शिकार ही नहीं कर पा रहा तो उसके खाने का क्या होगा। वह इधर उधर घूमने लगा पर कहीं कोई जानवर नहीं मिला। घूमते हुए वह एक बस्ती में आ पहुंचा।उसने सोचा शायद कोई मुर्गी या उसका बच्चा हाथ लग जाए। यही सोच कर वह इधर-उधर गलियों में घूमने लगा।

तभी कुत्तों का एक दाल भोंकते हुए उसके पीछे पड गया। सियार को जान बचाने के लिए भागना पडा। वह गलियों में घुसकर उनको छकाने की कोशिश करने लगा पर कुत्ते तो गाँव की गली-गली से परिचित थे। सियार भागता हुआ कपडे रंगने वालों की गली में आ पहुंचा। वहां उसे एक घर के सामने एक बडा बर्तन नजर आया। वह जान बचाने के लिए उसी बर्तन में कूद पडा। बर्तन मे कपडे रंगने के लिए नीला रंग घोल रखा था।

कुत्तों की टोली भौंकती रही और सियार सांस रोककर रंग में डूबा रहा। जब उसे पूरा यकीन हो गया कि अब कोई ख़तरा नहीं है तो वह बाहर निकला। पर अब तक वह नीले रंग में पूरी तरह से भीग चुका था।

जंगल में पहुंच कर उसने देखा कि उसके शरीर का सारा रंग नीला हो गया है। उसके नीले रंग को जो कोई भी जानवर देखता, वह भयभीत हो उससे दूर भाग जाता।

सबको इस तरह से डरा हुआ देखकर, रंगे सियार के दुष्ट दिमाग में एक योजना आई। उसने भागते जीवों को आवाज़ दी  ‘भाइओ, भागो मत और मेरी बात सुनो।’

उसकी बात सुन कर सभी भागते जानवर रुक गए। उनके हिचकिचाहट का रंगे सियार ने फ़ायदा उठाया और बोला “ध्यान से मेरा रंग देखो। क्या तुमने कभी और किसी जानवर का ऐसा रंग कभी देखा है? भगवान ने मुझे यह ख़ास रंग देकर तुम्हारे पास भेजा है। तुम सब जानवरों को बुला लाओ तो मैं भगवान का संदेश सुनाऊंगा”

उसके रंग ने सबको मंत्र मुग्ध कर दिया था। वे जाकर जंगल के दूसरे सभी जानवरों को बुलाकर लाए। जब सब आ गए तो रंगा सियार एक ऊंचे पत्थर पर चढकर बोला “जंगल के वासियों, भगवन ब्रहमा ने मुझे खुद अपने हाथों से इस नीले रंग का बना कर कहा कि संसार में जानवरों का कोई शासक नहीं है। तुम्हें जाकर जानवरों का राजा बन कर उनका कल्याण करना है। तुम्हारा नाम सम्राट ककुदुम होगा। तीनों लोकों के वन्य-जीव तुम्हारी प्रजा होंगे। अब तुम लोग अनाथ नहीं रहे । मेरी छत्र- छाया में निर्भय हो कर रहो।’

सभी जानवर वैसे ही सियार के अजीब रंग से चकराए हुए थे। उसकी बातों ने तो जादू का काम किया। शेर, बाघ व चीते  भी उसकी बातें सुनकर हैरान रह गए। उसकी बात काटने की किसी की हिम्मत न हुई।

देखते ही देखते सारे जानवर उसके चरणों में गिर पड़े और एक स्वर में बोले  ‘आज से आप ही हमारे सम्राट हैं और भगवन ब्रहमा की इच्छा का पालन करने में हमें बड़ी प्रसनता होगी।’

रंगा सियार ने सम्राट की शान से सबको चुप रहने का इशारा किया और बोला “तुम्हें अपने सम्राट की सेवा और आदर करना पड़ेगा। ध्यान रहे, हमें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। हमारे खाने-पीने का शाही प्रबंध होना चाहिए।”

शेर और चीते ने तुरंत कहा “जैसे आपकी आज्ञा महाराज। आपकी सेवा कर के हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।”

उसके बाद से सम्राट ककुदुम बने रंगे सियार के शाही ठाट शुरू हो गए और वह  राजाओं वाली शान से रहने लगा।

लोमडियां उसकी सेवा करती, भालू पंखा झुलाता। जिस जीव का मांस खाने की इच्छा ज़ाहिर होती, उसकी बलि दी जाती।

जब सियार घूमने निकलता तो हाथी बिगुल की तरह आगाज़ करते चलते और शेर उसके दोनों ओर उसकी सुरक्षा के लिए रहते।

रोज ककुदुम का दरबार भी लगता । रंगे सियार ने एक चालाकी की थी कि सम्राट बनते ही सियारों को शाही आदेश जारी कर उस जंगल से भगा दिया था। उसे अपनी सियार दोस्तों के द्वारा पहचान लिए जाने का ख़तरा था।

एक दिन सम्राट ककुदुम जब खा-पीकर अपने गुफा में आराम कर रहा था की बाहर उजाला देखकर वह उठ गया। बाहर आया तो चांदनी रात खिली थी। पास के जंगल में सियारों की टोलियां ‘हूहू SSS’ की बोली बोल रही थीं। उस आवाज़ को सुनते ही ककुदुम अपना आपा खो बैठा और उसके अदंर के जन्मजात स्वभाव ने ज़ोर मारा और वह भी मुंह चांद की ओर उठाकर और सियारों के स्वर में मिलाकर ‘हूहू SSS’ करने लगा।

शेर और बाघ ने उसे ’हूहू SSS’ करते देख लिया। वे चौंके, बाघ बोला ‘अरे, यह तो सियार है। हमें धोखा देकर सम्राट बना रहा। मारो इस को।’

शेर और बाघ यह कह कर उसकी ओर लपके और देखते ही देखते उसका शिकार कर डाला।

Moral :  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही  पाठ पढ़ाती है। 

यह कहानी हमें यह सिख देती है कि कोई भी ढोंग ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता, एक न एक दिन सचाई बहार आ ही जाती  है। इसलिए बेहतर यही है की अपने वास्तविक स्वरूप में ही रहें और इसे और भी बेहतर करने का प्रयास करें। 

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4. The Sparrow and the Monkey (गौरैया और बंदर)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

जंगल में एक पेड पर चिड़िया का घोंसला था। एक दिन  बहुत ज़बरदस्त  ठंड पड रही थी। ठंड से कांपते हुए कुछ बंदरो ने उसी पेड के नीचे शरण ले ली जहाँ चिड़िया रहती थी। 

पहला  बंदर बोला “आज बहुत सर्दी है। कहीं से आग सेकने का इंतेज़ाम हो जाए तो ठंड दूर हो सकती हैं।”

दूसरे बंदर ने तभी एक और इशारा करते हुए कहा  “देखो, यहां कितनी सूखी पत्तियां गिरी पडी हैं। इन्हें इकट्ठा कर हम ढेर लगा लेते हैं और फिर उसे सुलगाने का कुछ  उपाय सोचते हैं।”

बंदरों ने सूखी पत्तियों का ढेर बनाया और फिर पास में बैठकर सोचने लगे की ढेर को कैसे सुलगाया जाए। तभी एक बंदर की नजर दूर हवा में उडते हुए एक जुगनू पर पड गई और वह  ख़ुशी से अपने साथियों से बोला  “दोस्तों देखो , हवा में एक  चिंगारी उड रही हैं। अगर हम उसे पकड़ कर ढेर के नीचे रख दें, तो उसपर फूंक मारने से पत्तियों के ढेर में आग लग जाएगी।”

उसकी बात में हामी भरते हुए, बाकी बंदर भी  जुगनू की दिशा में  दौडने लगे। पेड पर अपने घोंसले में बैठी चिड़िया यह सब देख रही थे। उससे चुप नहीं रहा गया और वह बोली ” बंदर भाइयो, यह कोई चिंगारी नहीं हैं बल्कि यह तो एक जुगनू हैं।”

एक बंदर क्रोध से चिड़िया की  बोला –  “मूर्ख चिडिया, चुप चाप घोंसले में बैठी रहो । हमें सिखाने चली हो। ”

इस बीच एक बंदर ने  उछल कर जुगनू को अपनी हाथ में बंद कर लिया।  जुगनू को ढेर के नीचे रख दिया गया और सारे बंदर चारों ओर से ढेर में फूंक मारने  लगे।

चिड़िया ने फिर से  सलाह देनी चाही और बोलै “भाइयों, आप मेरी बात नहीं सुन रहे। इस तरह जुगनू से आग नहीं सुलगेगी। दो पत्थरों को टकरा कर उस से चिंगारी पैदा करके आप लोग इस ढेर में आग लगा सकते हो। ”

बंदरों ने चिड़िया की तरफ घूर कर देखा जैसे वह उसे चुप रहने का इशारा कर रहे हों ।

कुछ देर आग ना लगने पर चिड़िया फिर बोल उठी “भाइयों, आप मेरी सलाह मनो और कम से कम दो सूखी लकडियों को आपस में रगड कर तो देख लो”

सारे बंदर आग न सुलगाने के कारण खीजे हुए थे। तभी एक बंदर क्रोध से आगे बढा और उसने चिड़िया को पकडकर जोर से पेड के तने पर दे मारा और  चिड़िया फडफडाती हुई नीचे जा गिरी।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पढाती है। 

इस कहानी से भी हमें दो महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।  पहली तो यह की बिना मांगे किसी को भी सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि ऐसी दी गयी सलाह की कोई कीमत नहीं होती। और दूसरी यह की मूर्खों को सलाह देने का कोई लाभ नहीं होता। उल्टे सलाह देने वाले का ही अंत में नुक्सान होता है।

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5. Tit for Tat (जैसे को तैसा)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार किसी नगर में एक व्यापारी रहता था। दुर्भाग्य से उसे व्यापर में बहुत घाटा पड़ा और उसकी सारी संपत्ति समाप्त हो गई ही। उसने सोचा के किसी दूसरे देश में जाकर दुबारा व्यापार शुरू किया जाए। उसके पास एक भारी और मूल्यवान तराजू था जिसका वजन बीस किलो था। उसने अपने तराजू को एक सेठ के पास धरोहर की तरह रख दिया और काम करने दसूरे देश चला गया। 

देश विदेश घूम – घूमकर उसने व्यापार किया और  बहुत सारा धन कमाकर वह घर वापिस लौट आया । एक दिन उसने सेठ से अपना तराजू मााँगा। पर सेठ के मन में बेईमानी आ गई थी और वह बोला ” भाई  तुम्हारे तराजू को तो चूहे खा गए।’

व्यापारी ने कुछ न कहा।  थोड़ी देर उसने कुछ सोचा और फिर सेठ से बोला “सेठ जी, जब चूहे तराजू को खा गए तो आप कर भी क्या कर सकते हैं! मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूँ। यदि आप अपने लड़के को मेरे साथ नदी तक भेज दें तो बडी कृपा होगी।’ 

सेठ मन-ही-मन डरा हुआ था की कहीं  व्यापारी उस पर चोरी का आरोपन ना लगा दे। उसने आसानी से बात बनती देखी तो अपने लड़के को उसके साथ भेज  दिया । स्नान करने के बाद व्यापारी ने सेठ के लड़के को एक गुफा में बंद कर दिया और गुफा के द्वार पर एक बड़ी सी चट्टान लगा दी। उसके बाद वह सेठ के पास लौट आया। 

सेठ ने पूछा, ‘मेरा लड़के कहाँ रह गया?”

इस पर व्यापारी ने उत्तर दिया, “जब हम नदी किनारे बैठे हुए थे तो एक बडा सा बाज आया और झपट्टा मारकर आपके लड़के को उठाकर ले गया।”

सेठ क्रोध से भर गया। उसने शोर मचाते हुए कहा “तुम झूठे और मक्कार हो। कोई बाज इतने बडे लड़के को उठाकर कैसे ले जा सकता है? तुम मेरे लड़के को वापस दे दो नहीं तो मैं तुम्हारी शिकायत करूँगा।”

 व्यापारी ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं, हमें राजदरबार में ही चलना चाहिए ” 

दोनों न्याय पाने के लिए  राजदरबार पहुंचे । सेठ ने व्यापारी पर अपने पुत्र के अपहरण का आरोप लगाया।

न्यायाधीश ने व्यापारी से कहा, “सच सच बताओ, सेठ का लड़का कहाँ है?”

इस पर व्यापारी ने कहा  ‘जब हम नदी के तट पर बैठे हुआ थे तभी एक बडा-सा बाज झपटा मार कर इनके लड़के को पंजों में दबाकर उड गया। आप ही बताइये मैं उसे कहाँ से वापस कर दूँ?”

न्यायाधीश ने कहा, ‘तुम झूठ बोलते  हो। इतने बडे लड़के को एक बाज़ कैसे उठाकर ले जा सकता है?’ 

इस पर व्यापारी  ने कहा, ‘यदि  मेरे बीस किलो के तराजू को साधारण चूहे खाकर पचा सकते हैं तो बाज पक्षी होकर सेठ के लड़के को क्यों नहीं ले जा सकता है।”

न्यायाधीश ने इस बार सेठ से पूछा, “यह सब क्या मामला है सेठ जी?’ 

अंततः सेठ ने स्वयं सारी बात राजदरबार में बता दी। न्यायाधीश ने व्यापारी को उसका तराजू वापिस दिलवाया और सेठ का लड़का उसे वापस मिल गया।

 

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की लालच के वश में दूसरे का हक़ मरने वाले का सर हमेशा नीचा होता ही  है।

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6. The Talking Cave (बोलने वाली गुफा)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

एक घने जंगल में एक शेर रहता था। एक बार की बात है, वह दिन भर शिकार की तलाश में भटकता रहा, पर उसे कोई शिकार नहीं मिला ।

थका-हरा वह अभी घुम ही रहा था की उसकी नज़र एक गुफा पर गई। कुछ देर आराम करने के मन से वह उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया। वहां पहुँच कर जब उसने गुफा देखि तो उसने सोचा की यहाँ जरूर कोई जानवर रहता होगा और रात में वह इसमें अवश्य आएगा। आज मैं उसे ही मारकर अपनी भूख  मिटाऊंगा। 

उस गुफा में एक सियार का वास था जो रात में लौटकर अपनी गुफा पर वापिस आ गया। सियार ने गुफा के द्वार पर अंदर जाते हुए शेर के पैरों के निशान देख लिए। बहुत ध्यान से देखने पर उसे लगा की शेर अंदर तो गया है, पर वापिस बाहर नहीं निकला। वह समझ गया की शेर अभी भी गुफा में छिपा बैठा उसका ही इंतज़ार कर रहा है।

उस चालाक सियार ने तुरंत एक उपाय सोचा। वह गुफा के द्वार के पास ही खड़ा हो गया और उसने वहीँ से के आवाज लगायी “ओ मेरी बोलने वाली गुफा, आज तुम इस तरह से चुप क्यों हो? कुछ बोलती क्यों नहीं? जब भी मैं शाम को वापिस आता हूँ तो तुम मुझसे बातें करती हो, तो आज क्या हुआ?”

गुफा में बैठे हुए शेर ने मन ही मन सोचा की शायद सच में यह गुफा बोलती हो और इस सियार को आवाज़ दे कर बुलाती हो, और आज मेरे यहाँ होने से यह चुप है। फिर शेर ने खुद ही सियार को बुलाने का मन बनाया और अंदर से आवाज  लगायी , “आओ मेरे दोस्त,  तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही हूँ।  जल्दी से अंदर  आ जाओ “

आवाज सुनते ही सियार समझ गया की पक्का अंदर एक शेर बैठा है और उसकी राह देख रहा है। और वह तुरंत ही वहां से भाग खड़ा हुआ।

और इस तरह सियार ने चालाक  से अपनी जान बचा ली ।

Moral : पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं.

इस कहानी से भी हमे यही सीख मिलती  है हमें हमेशा  सतर्क रहकर अपने आस पास की चीज़ों  का ध्यान रखना चाहिए।  सियार ने भी अपनी चतुराई से यह समझ लिया की गुफा में शेर है और अपनी जान बचने में सफल रहा।  

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7. Foolish Heron and The Mongoose (मुर्ख बागला और नेवला)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

किसी जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसके खोल में कुछ बगुले रहते थे। उसी पेड़ की जड़ में एक साँप भी रहता था । वह बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को मौका देख कर खा जाता था।

उनमें से एक बगुला साँप द्वारा अपने बच्चों के बार-बार खाये जाने पर बहुत दुःखी था। एक दिन वह निराश हो कर नदी के किनारे अपना मन हल्का करने के लिए अकेले जा बैठा।

उसे इतना दुखी  देखकर, उस नदी में रहने वाला एक केकड़ा पानी से निकल कर बहार आया और उससे बोला, “क्या बात है दोस्त, तुम इतने उदास क्यों हो?”

बगुले ने कहा – “भाई, बात यह है कि जिस पेड़ पर मैं रहता हूँ उस की जड़ में एक साँप भी रहता है और वह हमारे बच्चों को बार-बार खा जाता है । मुझे इस मुश्किल से बचने का कोई उपाय  नहीं सूझ रहा है की इस साँप से कैसे छुटकारा पाया जाए । तुम्हें कोई उपाय सूझ रहा हो तो बताओ।”

केकड़े ने मन में सोचा, ’यह बगला हमेशा से मेरा दुश्मन रहा है, तो इसे ऐसा उपाय बताऊंगा जिससे साँप के साथ-साथ इसका भी नाश हो जाय”

यह सोचकर केकड़ा  बोला  “मित्र एक काम करो, मांस के कुछ टुकडे़ लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो । इसके बाद बहुत से टुकड़े उस बिल से शुरु करके साँप के बिल तक बखेर दो । नेवला उन टुकड़ों को खाता-खाता साँप के बिल तक आ जायगा और वहाँ साँप को देखकर उसे भी मार डालेगा ।”

बगुले ने ऐसा ही किया । नेवले ने साँप को तो खा लिया किन्तु साँप के बाद उस वृक्ष पर रहने वाले बगुलों को भी खा डाला ।

बगुले ने केकड़े के दिए हुए उपाय के बारे में तो सोचा, किन्तु उसके अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे और उसे अपनी मूर्खता का फल मिला। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है।

इस कहानी से हमे यह सीख मिलती है की किसी भी दी गयी सलाह पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए।  हमे किसी भी काम को करने से पहले उसके सही या गलत परिणाम अच्छे से सोच लेने चाहियें ।

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8. Weaver’s Knowledge and Decision (बुनकर का ज्ञान और निर्णय)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्र सम्प्राप्ति भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है, एक नगर में सोमिलिक नाम का जुलाहा रहता था। वह अपने काम में माहिर था, पर नगर में सबसे  और  रंगीन कपड़े बनाकर भी उसका मुश्किल से ही गुजर बसर होता था। अन्य जुलाहे सादा कपडा बनकर भी देखते देखते धनी हो गये थे।

उन्हें देखकर एक दिन सोमिलिक ने अपनी पत्नी से कहा “मामूली कपडा बुनने वाले जुलाहों ने भी कितना धन कमा लिया है और कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं। मैं इतने सुन्दर वस्त्र बनाने के बाद भी आज तक निर्धन ही हूँ। लगता है यह नगर नगर मेरे लिए भाग्यशाली नहीं है; अतः मुझे विदेश जाकर धन कमाने का प्रयास करना चाहिए ”  

सोमिलिक की पत्नी ने कहा,  “विदेश  में धन कमाना बहुत कठिन होता है। अगर भाग्य में धन मिलना होगा तो स्वदेश में ही मिल जायेगा और अगर नहीं मिलना हो तो हाथ आया सबकुछ भी लुट जाता है।अतः यहीं रहकर काम करते रहिये, भाग्य में लिखा होगा तो यहीं धन की प्राप्ति हो जायगी ।”   

सोमलिक यह सुन कर बोला -“भाग्य की बातें तो कमजोर लोग करते हैं जो मेहनत से डरते हों। लक्ष्मी हमेशा परिश्रम से प्राप्त होती है। मैं भाग्य की राह देखने की  जगह, विदेश जाकर जतन करूँगा और धन कमा कर दिखाऊंगा।” 

यह कहकर सोमलिक  वर्धमानपुर चला गया । वहां तीन वर्षों में अपनी मेहनत से  ३०० सोने की मुहरें लेकर वह घर की ओर चल पड़ा । रास्ता लम्बा  था तो आधे रास्ते में ही दिन ढल  गया और शाम हो चली । आस-पास कोई घर नहीं था । उसने एक मोटे वृक्ष की शाखा के ऊपर चढ़कर रात बितायी ।

सोते-सोते उसे एक स्वप्न आया जिसमें दो भयंकर दिखने वाले पुरुष आपस में बात कर रहे थे।

एक ने कहा – “हे पौरुष ! तुम्हें क्या मालूम नहीं है की सोमलिक के पास  भोजन-वस्त्र से अधिक  धन नहीं रह सकता, तब तुमने इसे ३०० मुहरें क्यों दीं ?”

दसूरा बोला – “हे भाग्य  ! मैं तो प्रत्येक मेहनत करने वाले को एक बार उसका फल देता ही हूँ। उस फल को उसके पास रहने देना या नहीं रहने देना तुम्हारे हाथ में है।”

स्वप्न के बाद सोमलिक  की नींद खुली तो देखा की मुहरों का पात्र खाली था। इतने कष्टों से इकठे किये धन के इस लुप्त हो जाने से सोमलिक बडा दुखी हुआ और सोचने लगा की वापिस जाकर सबको क्या मुंह दिखाऊंगा।  यह सोचकर वह फिर से वर्धमान पुर वापस आ गया ।

इस बार उसने दिन-रात घोर परिश्रम करके वर्ष भर में ही ५०० मुहरें जमा कर ली। उन्हें लेकर वह फिर से घर की ओर चल पड़ा। इस बार फिर आधे रास्ते में रात हो गई पर इस बार वह सोने के लिए ठहरा नहीं और चलता ही रहा। पर चलते-चलते  उसने फिर उन दोनों—पौरुष और भाग्य — को  पहले की तरह बात-चीत करते सुना ।

भाग्य ने फिर वही बात कही -“हे पौरुष  ! क्या तुम्हें मालूम नहीं की सोमलिक के पास भोजन वस्त्र से अधिक धन नहीं रह सकता । तब उसे तुमने ५०० मुहरें क्यों दीं ?”

पौरुष ने वही उत्तर दिया  —-“हे भाग्य  ! मैं तो प्रत्येक व्यवसायी को एक बार उसका फल दंगूा ही, इससे आगे तुम्हारे अधीन है की उसके पास फल रहने दे या छीन ले।”

इस बात-चीत के बाद सोमलिक  ने जब अपनी मुहरों की गठरी देखी तो वह मुहरों से खाली  थी । 

इस तरह दो बार खाली हाथ रह जाने से सोमलिक  का मन बहुत दुखी हुआ ।

उसने सोचा की इस धन-हीन जीवन से तो मृत्यु ही अच्छी है।

यही  सोच कर उसने पास के एक वृक्ष की टहनी से रस्सी बााँधी और लटकने को तैयार हो गया।

पर तभी एक आकाश-वाणी हुई—“सोमलिक ! यह गलती मत करो। मैंने ही तुम्हारा धन चुराया है । तुम्हारे भाग्य  में भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन नहीं लिखा। व्यथा के धनसंचय में अपनी शक्तियां नष्ट मत करो । घर जाकर सुख से रहो। तुम्हारे साहस से मैं प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहे एक वरदान मांग लो । मैं तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी करूँगा  ।” 

सोमलिक के मन में तो बस धन की चाह थी तो उसने फिर कहा, “मुझे वरदान में बहुत सारा धन दे दो।” 

अदृश्य देवता ने फिर कहा,  “धन का तुम्हें कोई उपयोग नहीं होगा क्यूंकि वह तुम्हारे भाग्य में नहीं है। भोग रहित धन को लेकर क्या करोगे?” 

सोमलिक तो धन का तरस रहा था, वह बोला, “भोग हो या न हो, मुझे धन ही चाहिए । बिना उपयोग के भी धन की बडी कीमत है। संसार में वही पूज्य माना जाता है, जिसके पास धन हो।”  

सोमलिक की बात सुनने के बाद देवता ने कहा, “अगर तुम्हारी धन की इच्छा इतनी ही प्रबल है तो तुम फिर से वर्धमानपुर चले जाओ। वहां दो बनियों  के पुत्र हैं – एक गुप्तधन, दूसरा उपभुक्त धन। इन दोनों प्रकार के धनों का स्वरुप  जानकर तुम वापसी में किसी एक का वरदान मांगना। यदि तुम उपभोग की योग्यता के बिना धन चाहेगा तो तुम्हें गुप्त धन दे दंगूा और यदि खर्च के लिए चाहेगा तो उपभुक्त धन दे दूंगा।” 

यह कहकर देवता लुप्त हो गए ।

सोमलिक उनके आदेश के अनुसार  फिर वर्धमानपुर  पहुंचा। शाम हो गई थी । पूछता-पूछता वह गुप्तधन के घर पर चला  गया । घर पर आये अतिथि का किसी ने सत्कार तक नहीं किया  । इसके विपरीत  उसे भला -बुरा कहकर गुप्तधन और उसकी पत्नी ने घर से बहार  धकेलना चाहा। पर सोमलिक संकल्प का पक्का था और सबकी मर्ज़ी के खिलाफ वह घर में घुसकर जा बैठा। भोजन के समय उसे गुप्तधन ने रूखी-सूखी रोटी दे दी । उसे खाकर वह वहीं सो गया ।

स्वप्न में उसने फिर वही दोनों देव दिखे। वे बातें कर रहे थे। एक कह रहा था — “हे पौरुष  ! तूमने गुप्तधन को भाग्य से इतना अधिक धन क्यों दे दिया  की उसने सोमलिक को भी रोटी दे दी ।”

पौरुष  ने उत्तर दिया —-“मेरा इसमें दोष नहीं । मुझे पुरुष के हाथों धर्म -पालन करवाना ही है, उसका फल देना तुम्हारे अधीन है ।” 

दुसरे दिन गुप्तधन बीमार हो गया और उसे उपवास करना पडा । इस तरह उसकी क्षतिपूर्ति हो गई ।

सोमलिक अगले दिन सुबह उपभुक्त धन के घर गया। वहां के घर वालों ने भोजन आदि द्वारा उसका सत्कार कराया । सोने के लिए सुन्दर बिस्तर दिए।

सोते-सोते उसने फिर से वही दोनों  देवों को सुना। एक कह रहा था —“हे पौरुष ! इसने सोमलिक का सत्कार करते हुए बहुत धन खर्च कर दिया  है । अब इसकी क्षतिपूर्ति  कैसे होगी ?” 

दसूरे ने कहा —“हे भाग्य  ! सत्कार के लिए  धन व्यय करवाना मेरा धर्म था, इसका फल देना तुम्हारे अधीन है ।” 

सुबह होने पर सोमलिक  ने देखा राज-दरबार से एक राज-पुरुष  राज -प्रसाद के रूप  में धन की भेंट  लाकर उपभुक्त धन को दे रहा था। 

यह देखकर सोमलिक  ने विचार किया  की  “यह संचय-रहित उपभुक्त धन ही गुप्तधन से श्रेष्ठ है । जिस धन का दान कर दिया जाए  या अच्छे कार्यों  में व्यय कर दिया  जाये वह धन संचित धन की अपेक्षा बहुत अच्छा होता है। ” 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है।

यह कहानी हमें सिखाती है की  गुप्त धन से उपभोकहत धन अच्छा होता है जो किसी सिद्ध कार्य में काम आये।

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9. Rat’s Wedding (चुहिया की शादी)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

गंगा नदी के किनारे  एक आश्रम था जहाँ पर योगी मुनि  रहते थे। एक बार जब वह नदी में स्नान कर रहे थे, तभी उनके हाथों में ऊपर से एक चुहिया आ गिरी । उस चुहिया को आकाश मे बाज ले जा  रहा था और बाज के पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई थी । मुनि को उस चुहिया पर दया आ गई।  यह सोच कर की बाकि लोग उनपर हसेंगे,  तो उन्होंने उस चुहिया को एक कन्या का रूप दे दिया और अपने आश्रम में अपनी बेटी की तरह ले आये । उनकी पत्नी ने भी कन्या बनी चुहिया का सत्कार किया। 

क्यूंकि उनकी अपनी कोई सन्तान नहीं थी , इसलिए मुनि पत्नी ने उसका  लालन पालन  बडे प्रेम से किया  । 18 वर्ष तक वह उनके आश्रम में रही और ज्ञान विद्या ग्रहण की।

जब वह विवाह योग्य अवस्था की हो गई तो पत्नी ने मुनि से उसके लिए एक काबिल वर ढूंढ़ने को कहा। 

मुनि तुरंत मान गए  और बोले की वह जल्दी ही अपनी इस अनोखी कन्या के लिए एक काबिल वर ढून्ढ निकालेंगे। 

अगले ही दिन मुनि ने अपने तप से सूर्य देव की प्राथना की और उनके समक्ष अपनी कन्या से पूछा की क्या उसे सूर्यदेव अपने वर के रूप में स्वीकार हैं की नहीं।

कन्या ने उत्तर  दिया —- “पिताजी ! यह तो सबको रौशनी देते हैं पर साथ ही यह बहुत गरम स्वाभाव के हैं, मुझे यह वर स्वीकार नहीं । इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि ने सूर्यदेव  से पूछा की  वह अपने से अच्छा कोई वर बताये ।

सूर्यदेव ने कहा “मुझ सेअच्छे तो बादल हैं जो मुझे ढककर छिपा सकते हैं।”

मुनि ने फिर बदलों के राजा की प्राथना की और उनके सामने अपनी कन्या से पूछा “क्या बादलों के राजा तुम्हें अपने वर के रूप में स्वीकार हैं?”

इस बार कन्या ने कहा “यह तो बहुत काले और ठंडे है। इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि ने बदलों के राजा से पूछा की उससे अच्छा कौन है।

बदलों के राजा ने कहा, “हम से अच्छी वायु है, जो हमें उडाकर  किसी भी दिशा में ले जा सकती है”

मुनि  ने वायु देवता  को बुलाया और कन्या से फिर पुछा।

कन्या ने कहा —-” यह तो बहुत चंचल हैं  और बार बार अपनी दिशा बदलते रहते हैं। इस से किसी अच्छे वर को बुलाइये।”

मुनि ने वायु देवता  से पुछा की उनसे अच्छा कौन है तो  वायु देवता ने कहा, “मुझ से अच्छा पर्वतराज  है, जो बडी से बडी आाँधी में भी स्थिर रहता है।”

मुनि ने पर्वतराज  को बुलाया  तो कन्या ने फिर  कहा—“यह तो  बहुत कठोर और अचल है। इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि  ने पर्वतराज  से पूछा की अपने से अच्छा कोई वर सुझाइये।

तब पर्वतराज  ने कहा —- “मुझसे अच्छा तो चूहा है, जो मुझे तोडकर अपना बिल बना लेता  है।”

मुनि ने तब चूहों के राजा को बुलाया और कन्या से फिर पूछा —- “अब तुम्हें यह मूषकराज स्वीकार हैं तो बताओ?”

मुनिकन्या ने मूषकराज को बडे ध्यान से देखा । वह प्रथम दृष्टि  में ही वह उस पर मुग्ध हो गई थी और अंत: वह बोली “हाँ पिताजी, मुझे यह पसंद हैं “

मुनि  ने अपने तपो बल  से उसे फिर से  चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह  कर दिया। 

 

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं.

इस कहानी से भी हमे यही सिख मिलती  है की चाहे हम कितना भी बदल जाएँ हमारा मूल स्वभाव हमेशा एक सा रहता है।

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10. The Elephants and the Rats (हाथी और चूहे)

“A friend in need is a friend in deed”. We all have heard this quote. Listen to this story from the collection Panchatantra stories for kids in Hindi to know why.

Once there lived a large group of rats and their king in a deserted town. The town was situated between a forest and a lake. In the forest lived a group of elephants and their king. When the forest started to run dry and elephants started to die of thirst, someone informed elephants about the lake across the town. Elephants crossed the town in search of water and in the process, they crushed many rats under their huge feet. When this became a daily process, the rat king decided to talk to the elephant king to apprise him of this and request him to change their path to the lake. Hearing this, the humble elephant king apologized and agreed to change the route. 

There came a time when the elephants were in trouble as King’s men started to catch them. One day the Elephant king got trapped in the nets. When no other elephant came forward to help him, he called for the rat king to his rescue who along with other members of his rat clan was pleased to return the favor. 

Moral of the Panchatantra story: This Panchatantra story for children teaches us that a friend in need is a friend indeed.

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11. The Monkey and the Bird (बंदर और चिड़िया)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक घने जंगल के वृक्ष की शाखाओं पर चिड़ा-चिडी़ का एक जोड़ा रहता था। अपने घोंसले में दोनों बड़े सुख और आराम से जीवन व्यतीत कर रहे थे।

जब सर्दियों का मौसम आया तो एक दिन बहुत ही  ठंडी हवा चलने लगी और साथ में  हलकी हलकी  बारिश भी शुरु हो गई। उसी समय एक बन्दर ठण्ड और बारिश से ठिठुरता हुआ उस वृक्ष की शाखा पर शरण लेने आ पहुंचा।

ठंड के मारे उसके दांत कटकटा रहे थे और वह गर्मी लेने के लिए जोर जोर से हाथों को रगड़ रहा था।

उसे देखकर चिड़िया ने कहा  “कौन हो तुम? देखने में तो तुम्हारा चेहरा आदमियों जैसा है, तुम्हारे हाथ पैर भी हैं। फिर भी तुम यहाँ बैठे हो, कहीं अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते?”

बन्दर बोला  “आरी ओ चिड़िया , मैंने तुम से कोई सलाह मांगी है क्या? तुम अपना काम करो और मुझे व्यर्थ तंग ना करो।  “

मगर चिड़िया चुप न हुई और उसने फिर कहा “अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो अपने लिए एक आलीशान घर बनाती और मज्जे से वहां रहती”

बन्दर ने उसे एक बार फिर घुर्र कर  देखा और चुप रहने को कहा। 

चिड़िया फिर भी कुछ न कुछ बोलती रही जिस से  बन्दर पूरी तरह चिड़ गया। क्रोध में आकर बन्दर ने चिड़िया के घोंसले को तोड़-फोड़ डाला जिसमें चिड़िया अपने परिवार के साथ ख़ुशी से रहती थी। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पढाती है। 

इस कहानी से भी  हमे यह शिक्षा मिलती है की हमें हर किसी को उपदेश नहीं देना चाहिये। किसी मूर्ख को दी गयी शिक्षा का फल कई बार उल्टा निकल सकता है।

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12. The Foolish Friend (मूर्ख मित्र)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है।  एक राजा ने अपने राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रखा हुआ था । वह बन्दर राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था। राजा की आज्ञा से अन्तःपुर में भी वह बन्दर बिना किसी दरबारी के रोके आ जा सकता था ।

एक दिन जब राजा सो रहा था तो बन्दर वहीँ बैठा उसको पन्खा  झल रहा था।  अचानक बन्दर ने देखा की एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी। पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी और थोड़ी ही देर में वापिस उड़कर फिर वहीं बैठी जाती।

बन्दर को बहुत क्रोध आ गया। उसे फर्क थी की एक मक्खी की वजह से कहीं उसके मालिक की नींद ख़राब न हो जाए।  उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली।  और इस बार जैसे ही मक्खी राजा की छाती पर बैठी तो उसने पूरी तकत से मक्खी पर तलवार का हाथ छोड़ दिया ।

मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की छाती के तलवार की चोट से दो टुकडे़ हो गई और राजा ने वहीँ प्राण त्याग दिए। 

 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। 

इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की विद्वान शत्रु की अपेक्षा मूर्ख मित्र ज़्यादा खतरनाक होता है। 

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13. Right Mind and Wrong Mind (सही दिमाग और गलत दिमाग)

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