Panchatantra Stories
in Hindi

Listen or Read the best Hindi Panchatantra Stories

Panchatantra Stories in Hindi

Best Panchatantra Stories in Hindi

Panchatantra Stories in Hindi are the wise old moral stories for kids and adults alike. This podcast and stories collection is Chimes Radio’s take on these classic old stories which are also popularly known as ‘Panchtantra ki Kahaniyan’ and one that has been part of Indian culture since the 2nd century.

Panchatantra stories use animals as protagonists. The purpose is not just to entertain the audience but also to help them understand the basics of life and teach them important life lessons on morality and empathy. In other words, these Panchatantra Stories in Hindi comes with a great mix of entertainment and learning, making each story a great hit with the listeners.

History of Panchtantra Ki Kahaniyan

Panchatantra Stories are an ancient collection of animal fables and the entire scripture is divided into Five (Panch) core Teachings (Tantras) with each part having a frame story with other stories interwoven within it. These five parts are:

  1.  Loss of Friend (Mitra bhed)
  2. Winning of Friends (Mitra Labh)
  3. On Crows and Owls (Kākolūkīyam)
  4. Loss of Gains (Labdhapraṇāśam), and
  5. Ill Considered Actions (Aparīkṣitakārakaṃ)

All Panchatantra stories comprises of animals as lead characters with human virtues and vices. These moral stories for kids have been adapted in every major Indian language and can now be enjoyed as a podcast on Free Chimes Radio mobile apps – available in Google and Apple App stores.

Who wrote Panchatantra Stories?

Legend has it that these Panchatantra stories in Hindi were originally written in the Sanskrit language around 200-300 BC. These tales are attributed to Pandit Vishnu Sharma who was tasked by King Amarasakti of Mahilaropyam in the south of India to impart knowledge and wisdom to his three princes. Hence, Pandit Vishnu Sharma used these moral stories to enlighten the princes within a period of six months and subsequently these stories have been passed on from one generation to another. 

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List of Panchatantra Stories in Hindi

Enjoy 20 Most Popular Panchtantra Hindi Stories

1. Merchant, King and Servant (व्यापारी, राजा और नौकर)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

बहुत समय पहले की बात है, वर्धमान नगर में एक बहुत ही समझदार व्यापारी रहता था। उसका नाम दांतिल था। वह राज्य का सारा काम काज देखा करता था और उसके न्याय और चतुराई से सब बहुत प्रसन थे। अपने इसी काम काज के कारन वह राजा का भी प्रिय बन गया था। 

 कुछ दिनों बाद व्यापारी की बेटी की शादी थी।   इस ख़ुशी में उसने बहुत बड़े भोजन का आयोजन किया। भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा, सभी को न्योता दिया।

सब मेहमानों में से एक मेहमान राजघराने का सेवक भी था। वह महल में राजा के कमरे में झाड़ू लगाता था और राजा का बहुत पुराणा नौकर था। पर गलती से वह नौकर एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो राज परिवार के लिए रखी गयी  थी।  यह देखकर व्यापारी को बहुत गुस्सा आया  और
उसने सेवक को  धक्के देकर बाहर निकल दिया।सेवक को बहुत बुरा लगा 
पर एक सेवक इतने प्रभावशाली व्यापारी से कैसे जीत सकता था?  इसलिए उसने मन ही मन सोचा की जो कुछ भी करना पड़ेवह दंतिल और राजा में फुट पड़वा कर ही मानेगा। 

 कुछ दिनों बाद वही सेवक राजा के महल में झाड़ू लगा रहा था। वह आधी नींद में सो रहे राजा को देख कर बोलने लगा इस व्यापारी की यह मजाल की वह रानी जी के साथ ऊँची आवाज़ में बात करे?”

यह सुनकर राजा अपने बिस्तर से उठा और उसने सेवक  से पूछा, “यह तुम क्या बोल रहे होक्या यह सच है? तुमने व्यापारी को रानी से ऊंची आवाज़ में बात करते हुए देखा था क्या ?”

सेवक ने तुरंत राजा के चरण पकडे और बोला: मुझे माफ़ कर दीजिये महराज , मैं पूरी रात जागता रहा और बिलकुल  सो न सका।  इसीलिए नींद में कुछ भी बोल  रहा हूँ।

राजा ने उससे कुछ नहीं बोला पर वह मन ही मन सोचने लगा की कही यह बात सच तो नहीं।  उसी दिन से राजा ने व्यापारी के महल में आने जाने पर रोक लगा दी। अगले दिन जब व्यापारी महल में आया तो उसे सैनिकों ने अंदर जाने से रोक दिया। यह देखकर व्यापारी बहुत हैरान हुआ। 

उसको समझ नहीं आ रहा था की उससे ऐसी क्या बात हो गई जो राजा ने एक दम से उसके सब अधिकार छीन लिए।

तभी वहीँ खड़े सेवक ने मज़ाक बनाते हुए कहा सैनिकों, ज़ारा अदब से बात करो इनसे। तुम जानते नहीं ये कौन हैं ये राजा के ख़ास  हैं और बहुत शक्तिशाली भी। यह तुम्हें एक मिनट में बहार फिकवा सकते हैं, जैसा इन्होने मेरे साथ अपनी बेटी की शादी में किया था।

यह सुनते  ही व्यापारी को सारी बात समझ में आ गयी।

फिर कुछ दिन बाद व्यापारी ने सेवक को बड़े आदर सत्कार के साथ अपने घर दुबारा बुलायाउसकी खूब सेवा करी और तोहफे भी दिए। फिर उसने बड़े प्यार से भोज वाले दिन के लिए माफ़ी भी मांगी। 

सेवक इस आव भाव से बहुत खुश था और उसने मन ही मन दंतील का सारा खोया हुआ सम्मान वापिस दिलाने की ठान ली। 

अगले दिन वह फिर नींद में सो रहे  राजा को देख कर बोला हे भगवान, हमारा राजा तो ऐसा मूर्ख है की वह पुराणा बासी खाना भी खा जाता है

यह सुनकर राजा को बहुत क्रोध आया और बोला – “मूर्ख सेवक, तुम्हारी ऐसी बोलने की हिम्मत कैसे हुईतुम अगर मेरे महल के पुराने वफादार न होते तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।

सेवक ने दोबारा पैरों में गिर कर मांफी मांगी और दोबारा कभी ऐसा न बोलने की कसम खायी ।

राजा भी सोचने लग गया कि जब यह मेरे बारे में ऐसे बोल सकता है तो  ज़रूर  ही इसने व्यापारी के बारे में भी गलत बोला होगा, जिसकी वजह से
मैंने उसे बेकार में सज़ा दे दी।  
अगले दिन ही राजा ने व्यापारी को महल में उसका खोया सम्मान  वापस लौटा दिया ।

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का  पाठ पढ़ाती हैं  और इस कहानी से हमे बातें सीखने को मिलती हैं। पहली ये कि हमें हर किसी के साथ सद्भाव और समान भाव से ही पेश आना चाहिए, चाहे वह व्यक्ति  बड़ा हो या छोटा। हमेशा याद रखें, जैसा व्यव्हार आप खुद के साथ होना पसंद करेंगे वैसा ही व्यव्हार दूसरों के साथ भी करें। 

दूसरी ये कि हमें सुनी सुनाई बातों  पर यकीन नहीं करना चाहिए बल्कि किसी बात का शक होने पर, अच्छी तरह जाँच पड़ताल करके ही निर्णय लेना चाहिए।

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2. Bird and the Proud Elephant (चिड़िया और घमण्डी हाथी)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक पेड़ पर एक चिड़िया अपने पति के साथ रहती थी। एक बार उसने अपने घोंसले में अंडे दिए   एक दिन चिड़िया अपने अंडों के पास बैठी थी और उसका पति खाना ढूंढ ने गया हुआ था। तभी वहां एक मतवाला हाथी आया और आराम करने के लिए उसी पेड़ के नीच रुक गया।  अपनी मस्ती में उसने वही टहनी तोड़ डाली जिस पर चिड़ा चिड़ी का घोंसला  था और सारे अंडे गिर कर टूट गए।

हाथी तो कुछ देर बाद वहां से चला गया पर चिड़िया  बहुत दुखी हुई और जोर जोर से रोने लगी। तभी उसका पति भी वापस आ गया।  अपने अण्डों को टुटा देख कर वह भी बहुत दुखी हुआ और उन दोनों ने हाथी से बदला लेने और उसे सबक सिखाने का फैसला किया।

वे दोनों अपने मित्र कठफोड़वा ( जिसको अंग्रेजी में woodpecker कहते हैं ) उसके पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई। वे हाथी से बदला लेने के लिए कठफोड़वे की मदद चाहते थे। उस कठफोड़वे के दो और दोस्त भी थे जिन मे से एक थी मधुमक्खी और दूसरा था मेंढक। उन सब ने मिलकर हाथी से बदला लेने की योजना बनाई।

योजना के अनुसार सबसे पहले मधुमक्खी ने हाथी के कान में मधुरता से गुन-गुनाना शुरू किया जिससे हाथी अपनी मस्ती में ऑंखें बंद करके चलने लगा।

जब हाथी संगीत में डूबा हुआ था तो कठफोड़वा ने हाथी की दोनों आँखें फोड़ दी। दर्द से हठी जोर जोर से कराहने लगा।

उसके बाद मेंढक ने एक बड़े गड्डे के पास जा कर टर्राना शुरू कर दिया। मेंढक की आवाज़ सुन कर हाथी को लगा कि पास में ही कोई तालाब है। वह उस आवाज की दिशा में चल पड़ा  और गड्डे में जा गिरा जिससे बहार निकल पाना उसके बस की बात नहीं थी।

Moralपंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती हैं। इस कहानी से भी हमें यह शिक्षा मिलती है कि कमजोर से कमजोर लोग भी यदि एक जुट हो कर काम करें तो बड़े से बड़ा कार्य संपन्न कर सकते हैं और ताकतवर शत्रु को भी पराजित कर सकते है। 

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3. The Blue Jackal (नीला सियार)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

किसी जंगल में चंडराव नाम का एक सियार रहता है।  बूढ़े हो जाने के कारण अब उससे पहले जैसे शिकार नहीं हो पाता था। एक दिन खाना ढूँढ़ते हुए वह लोभवश गांव में जा पहुंचा।   

तभी कुत्तों का एक दाल भोंकते हुए उसके पीछे पड गया। सियार को जान बचाने के लिए भागना पडा। सियार भागता हुआ कपडे रंगने वालों की गली में आ पहुंचा। वहां उसे एक घर के सामने एक बडा बर्तन नजर आया। वह जान बचाने के लिए उसी बर्तन में कूद पडा। बर्तन मे कपडे रंगने के लिए नीला रंग घोल रखा था।

जब कुत्तों की टोली चली गई तो वह चुप चाप बहार निकला और जंगल वापिस लौट गया।

जंगल में पहुंच कर उसने देखा कि उसके शरीर का सारा रंग नीला हो गया है। उसके नीले रंग को जो कोई भी जानवर देखता, वह भयभीत हो उससे दूर भाग जाता।

सबको इस तरह से डरा हुआ देखकर, रंगे सियार के दुष्ट दिमाग में एक योजना आई। उसने भागते जीवों को आवाज़ दी  भाइओ, भागो मत और
मेरी बात सुनो।

उसकी बात सुन कर सभी भागते जानवर रुक गए। उनके हिचकिचाहट का रंगे सियार ने फ़ायदा उठाया और बोला “ध्यान से देखो। क्या तुमने कभी और किसी जानवर का ऐसा रंग कभी देखा हैभगवान ने मुझे यह ख़ास रंग देकर तुम्हारे पास भेजा है।  और कहा कि संसार में जानवरों का कोई शासक नहीं
है। तुम्हें जाकर जानवरों का राजा बन कर उनका कल्याण करना है। तुम्हारा नाम सम्राट ककुदुम होगा। अब तुम लोग मेरी छत्र- छाया में निर्भय हो कर रहो।
‘ 

शेरबाघ व चीते  उसकी बातें सुनकर हैरान रह गए। उसकी बात काटने की किसी की हिम्मत न हुई। देखते ही देखते सारे जानवर उसके चरणों में गिर पड़े और एक स्वर में बोले  आज से आप ही हमारे सम्राट हैं। 

उसके बाद से सम्राट ककुदुम बने रंगे सियार के शाही ठाट शुरू हो गए। उसने शेर को अपना प्रधान मंत्री, भाघ को सेना पति और भेड़िये को संत्री बनाया।  उसने बाकि सब सियारों को जंगल से तुरंत निकलवा दिया जो की कोई उसका पुराण साथी उसे पहचान न ले।  छोटे छोटे जीव जानवरों की बलि सम्राट ककुदुम के भोजन के लिए दी जाने लगी।

कुछ दिन तो उसका राज्य बड़े आराम से चलता रहा पर फिर एक दिन ऐसा आया की जब वह अपनी गुफा में आराम कर रहा था तो उसे बाहार दूसरे सियारों की हूँ हूँ हूँ की आवाज़ सुनाई दी।  बिना सोचे समझे उसने भी अपने वास्तिक आवाज़ में सियारों की तरह किलकारियां मारनी शुरू कर दीं।  

शेर और बाघ ने उसे हूहू करते देख लिया। वे चौंकेबाघ बोला अरे, यह तो सियार है। हमें धोखा देकर सम्राट बना रहा। मारो इस को।‘ 

शेर और बाघ यह कह कर उसकी ओर लपके और देखते ही देखते उसका शिकार कर डाला।

Moral :  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही  पाठ पढ़ाती है।  यह कहानी हमें यह सिख देती है कि कोई भी ढोंग ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता, एक न एक दिन सचाई बहार आ ही जाती  है। इसलिए बेहतर यही है की अपने वास्तविक स्वरूप में ही रहें और इसे और भी बेहतर करने का प्रयास करें।  

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4. The Bird and The Monkeys (चिड़िया और बन्दर)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

किसी पर्वत के एक भाग में कुछ बंदरों का दल रहता था।  जब सर्दियों का मौसम आया तो बहुत जबरदस्त ठण्ड पड़ी।  बंदरों का ठण्ड से बुरा हाल था।  वह इधर उधर ठण्ड से बचने का कोई उपाय सोचते फिर रहे थे।  कभी पेड़ के नीचे बैठते तो कभी हाथ मलने लगते। 

तभी उनकी नज़र एक जुगनू पर पड़ी तो पास ही उड़ा जा रहा था। 

एक बन्दर ने सुझाव दिया “वह देखो, एक चिंगारी उडी जा रही है। क्यों न इसे पकड़ कर आग जला ली जाये और इस ठण्ड का निपटारा किया जाये?”

बाकि सब बन्दर एक दम से उसकी बात मान गए और उन्होंने जुगनू को पकड़ लिया।

सब ने आस पास से सुखी घास पत्तियां इकठी कर जुगनू के ऊपर रख दीं और जोर जोर से फूंकें मारने लगे।

पेड पर अपने घोंसले में सूचीमुख नाम की चिड़िया बैठी यह सब देख रही थे। उससे चुप नहीं रहा गया और वह बोली बंदर मित्रोंयह कोई चिंगारी नहीं हैं जिससे आग लग जाएगी। यह तो उड़ने वाला जुगनू हैं।  ठण्ड से बचाना है तो कोई गुफा ढूंढ कर उस में चले जाओ।”

उन बंदरों में से एक बजुर्ग बन्दर आगे बढ़ कर बोला “ओये सूचीमुख चिड़िया, इनके चक्कर में मत पड़।  इनको समझाना ना-मुमकिन है और इनके बीच में फस कर तू खुद ही अपना नुक्सान न कर लेना। “

बाकि बन्दर कुछ देर और जुगनू को फूँक मार-मार कर आग जलाने की कोशिश में लगे रहे।

अंत में चिड़िया से रहा नहीं गया और वह फिर बोल पड़ी “अरे तुम लोग समझते क्यों नहीं?  जुगनू से आग नहीं जलाई जाती।  व्यर्थ में मेहनत मत करो और कोई और उपाय सोचो।”

यह सुनते ही बंदरों के सबर का बाँध टूट गया। तभी एक बंदर क्रोध से आगे बढा और उसने चिड़िया को पकडकर जोर

से पेड के तने पर दे मारा और  चिड़िया फडफडाती हुई नीचे जा गिरी।

Moralपंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पढाती है।  इस कहानी से भी हमें दो महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।  पहली तो यह की बिना मांगे किसी को भी सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि ऐसी दी गयी सलाह की कोई कीमत नहीं होती। और दूसरी यह की मूर्खों को सलाह देने का कोई लाभ नहीं होता। उल्टे सलाह देने वाले का ही अंत में नुक्सान होता है।

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5. Little Rabbit and The Lion (नन्हा खरगोश और शेर)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक जंगल में भासुरख नाम का बहुत ताकतवर शेर रहता था। जब भी वह शिकार पर निकलता, तो अपनी मस्ती में वह कई कई जानवरों का शिकार कर डालता

सारे जानवर डरने लगे कि अगर शेर इसी तरह से शेर शिकार करता रहा तो जल्द ही जंगल के सभी जानवरों का सफाया हो जायेगा।

शेर को रोकना अब अनिवार्य लगने लगा था।  यही सोच कर एक दिन जंगल के सभी जानवर इकट्ठा हुए और तय किया कि वे भासुरख से निवेदन करेंगे की वह हर रोज एक से अधिक जानवरों का शिकार न किया करे। 

अगले ही दिन जानवरों का एक दल शेर के पास पहुंचा। उनको अपनी ओर आते देख शेर ने गरजकर उनसे वहां आने का कारण पूछा। 

जानवरों के नेता ने डरते हुए कहा अपनी बात कही, ‘‘महाराज, जिस तरह से आप जंगल के जानवरों का शिकार कर रहे हैं, ऐसे तो जंगल मैं कोई भी नहीं बचेगा। इसलिए हम विनती करते हैं की आप शिकार पर मत जाएँ और हम खुद ही हर रोज आपके भोजन के लिए एक जानवर भेज दिया करेंगे। “

शेर को लगा कि जानवरों की बात भी सही है। उसने पल भर सोचा, फिर बोला ठीक है, पर अगर किसी भी दिन तुम ने मेरे खाने के लिये भोजन नहीं भेजा तो मैं तुम में से किसी को भी नहीं छोडूंगा।

जानवरों ने शेर की शर्त मान ली और  उसके बाद से सब जानवर फिर से आराम से जंगल में घूमने लगे।हर रोज शेर के खाने के लिये एक जानवर भेजा जाने लगा और  इसके लिये जंगल में रहने वाले सब जानवरों का एक – एक करके चयन होता। 

फिर एक दिन खरगोशों का भी दिन आया और उनमें से एक छोटे से खरगोश को चुना गया। वह था बहुत चालाक खरगोश और उसने सोचा, ” शेर के हाथों मरने से कोई फायदा नहीं। कोई तरकीब सोचनी पड़ेगी जिससे जान भी बच जाये और जंगल को हमेशा के लिए शेर से छुटकारा भी  मिल जाये।

अगले दिन वह इसी सोच में शेर की गुफा की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे एक कुआँ दिखाई दिया जिसमे उसने अपनी परछाई देखी। बस, यह देखते ही उसके दिमाग में इस समस्या से निकलने का एक उपाय आ गया।

खरगोश आराम से घूमते फिरते जब तक शेर के पास पहुंचा तो बहुत देर हो चुकी थी और भूख के मारे शेर का बुरा हाल था। 

इतने छोटे से खरगोश को देख कर शेर ने गरजकर बोला, ‘‘तुम लोगों की इतनी हिम्मत की तुम जैसे छोटे से खरगोश को मेरी भूख मिटने के लिए भेजा है? क्या लगता है की तुमसे मेरी भूख मिट जाएगी? ऊपर से तुम आये भी इतनी देरी से।  आज तुम्हें खा कर कल में सारे जंगल के जानवरों का शिकार कर दूंगा।” 

नन्हे खरगोश ने शेर को झुककर कहा, ‘‘महाराज आप व्यर्थ ही गुस्सा कर रहे हैं. इसमें मेरा या किसी और जानवर का कोई दोष नहीं है।  अगर आप मेरी पूरी बात कहने का मौक्का दें तो आपको सब पता चल जायेगा। 

शेर ने खरगोश की बात सुन कर कहा “जो केहना है, जल्दी से बोलो। भूख से मेरी जान निकल रही है “

खरगोश ने कहा “हम जानते थे की मेरे जैसे नन्हा सा एक खरगोश आपकी भूख मिटने के लिए प्रयाप्त नहीं होगा।  इसलिए जंगल वासिओं ने मेरे साथ चार और खरगोश भेजे थे।  लेकिन रास्ते में हमें एक और शेर मिल गया और उसने हमें रोक कर पूछा की हम कहाँ जा रहे हैं

जब हमने बताया की हम इस जंगल के महाराज भासुरख के भोजन के लिए जा रहे हैं तो उस दूसरे शेर ने कहा की आज से इस जंगल का राजा वही है और यह कह कर वह मेरे चार साथियों को खा गया। उसने मुझे आपके पास यह सन्देश देने के लिए भेज दिया की अगर आप में हिम्मत है तो उसे हरा कर जंगल के राजा बन जाएँ। बस इसीलिए मुझे देर हो गई।”   

खरगोश की बात सुनकर भासुरख को बड़ा गुस्सा आया और वह बार-बार गरजने लगा।

उसकी भयानक गरज से पूरा जंगल हिल गया। ‘‘जल्दी से मुझे उस दूसरे शेर का पता बताओ, आज मैं उसे नहीं छोडूंगा।  मुझे चनौती देने की सज़ा उस दूसरे शेर को आज जरूर मिलेगी।  जब तक में उसका शिकार न कर दूँ, में भोजन भी नहीं करूँगा।”

खरगोश ने कहा “यदि महाराज का यही निर्णय है तो में अभी आपको उसकी ज़मीन के अंदर वाली गुफा पर ले चलता हूँ जहाँ से निकल कर उसने हमारा रास्ता रोका था।”

खरगोश रास्ता दिखाते हुआ शेर को कुएँ के पास ले गया और बोला, ‘‘ महाराज, वह दुष्ट शेर ज़मीन के नीचे बानी इसी गुफा में रहता है।’’

खरगोश ने कुएं के नजदीक जाकर शेर से अन्दर झांकने के लिये कहा। शेर ने कुएं के अन्दर झांका तो उसे कुएं के पानी में अपनी परछाईं दिखाई दी।

परछाईं को देखकर शेर ज़ोर से दहाड़ा। कुएं के अन्दर से आती हुई अपने ही दहाड़ने की गूंज सुनकर उसने समझा कि दूसरा शेर भी दहाड़ रहा है। दुश्मन से तुरंत लड़ने के इरादे से वह कुएं में कूद पड़ा और डूब गया। 

इस तरह चतुराई से शेर से छुट्टी पाकर नन्हा खरगोश घर लौटा। उसने जंगल के जानवरों को शेर के डूबने की कहानी सुनाई। दुश्मन के मारे जाने की खबर से सारे जंगल में खुशी फैल गई और जंगल के सभी जानवर खरगोश की जय-जयकार करने लगे।

Moralपंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन  को सही तरीके से जीने का पाठ पढ़ाती हैं। ये कहानी भी हमें सिखाती है कि घोर संकट में भी हमें सूझबूझ और चतुराई के साथ काम लेना चाहिए और आखिरी दम तक प्रयास करते रहना चाहिए।  जिस तरह खतरे में होते हुए भी खरगोश ने चतुराई से काम लेकर शेर जैसे खतरनाक और उससे कहीं अधिक बलशाली शत्रु को पराजित कर दिया, ठीक उसी तरह सूझबूझ और चतुराई से काम लेकर हम भी बड़े से बड़े संकट से बहार निकल सकते हैं।

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6. Foolish Talkative Tortoise (मूर्ख बातूनी कछुआ )

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है, एक तालाब मैं कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ रहता था।  उसी तालाब में प्रति दिन हो हंस आया करते थे जिनका नाम संकट और विकट था।  तीनों में गहरी दोस्ती हो गई और वह  मिल कर वार्तालाप किया करते थे।

एक बार ज़बरदस्त सूखा पडाऔर तालाब का पानी सूखने लगा। सब साथ के जीव जंतु मरने लगे तो कछुए को भी संकट दिखने लगा।  एक दिन कछुए ने अपने दोस्त हंसों से कहा “पानी के बिना इस तालाब में तो मेरा मरना निश्चित है। तुम दोनों को कोई उपाय सूझे तो बताओ।”

हंस भी अपने मित्र पर आयी मुसीबत को दूर करने का उपाय सोचने लगे।

बहुत सोच विचार के बाद यह उपाय निकला गया की पास के गाओं से एक बांस की लकड़ी लाई जाये जिसके मध्य भाग को कछुआ अपने मुंह से पकड़ लेगा।  दोनों हंस लकड़ी के दूसरे किनारों से पकड़ कर उड़ सकेंगे और कछुआ को वहां से कुछ दूर जो बड़ा तालाब था, वहां उड़ा कर ले जायेंगे। 

हंसों ने कछुए को चेतावनी  देते हुए कहा याद रखना, उड़ान के दौरान अपना मुंह न खोलना। वरना ज़मीन पर नीचे गिर जाओगे और अपने प्राणो से हाथ धो बैठोगे।

कछुए के पास और कोई चारा भी नहीं था।  वह खुद चल कर इतनी दूर तालाब तक कभी नहीं पहुँच सकता था।

फिर योजना अनुसार तीनों उड़ चले। जब वह एक गांव के ऊपर से जा रहे थे तो कछुए को बहुत शोर सुनाई दिया।  उसने नीचे देखा की सब गांव वाले सर उठा  देख रहे हैं और हस रहे हैं।  लोगों के लिए यह अजीब दृश्य था और छोटे बच्चे खूब जोर से शोर मचा रहे थे।  

यह देख कर कछुए से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ा “दोस्तों देखो सब हमारी तरफ ही देख रहे हैं।”

मुंह के खुलते ही लकड़ी उसके मुँह से निकल गयी और वह सीधा नीचे ज़मीं पर जा गिरा। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती हैं।  कुछ भी बोलने से पहले परिस्थिति और मौके की नज़ाकत को भांप लेने में ही समझदारी है और उसके बाद ही हमें अपना मुँह खोलना चाहिए।  क्योंकि बे मौके मुंह खोलना कभी-कभी बहुत महंगा पड़ सकता  है।

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7. The Sparrow and The Monkey (गौरैया और बन्दर )

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक घने जंगल के वृक्ष की शाखाओं पर चिड़ा-चिडी़ का एक जोड़ा रहता था। अपने घोंसले में दोनों बड़े सुख और आराम से जीवन व्यतीत कर रहे थे।

जब सर्दियों का मौसम आया तो एक दिन बहुत ही  ठंडी हवा चलने लगी और साथ में  हलकी हलकी बारिश भी शुरु हो गई। उसी समय एक बन्दर ठण्ड और बारिश से ठिठुरता हुआ उस वृक्ष की शाखा पर शरण लेने आ पहुंचा।

ठंड के मारे उसके दांत कटकटा रहे थे और वह गर्मी लेने के लिए जोर जोर से हाथों को रगड़ रहा था।

उसे देखकर चिड़िया ने कहा “कौन हो तुमदेखने में तो तुम्हारा चेहरा आदमियों जैसा है, तुम्हारे हाथ पैर भी हैं। फिर भी तुम यहाँ बैठे हो, कहीं अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते?”

बन्दर बोला “आरी ओ चिड़ियामैंने तुम से कोई सलाह मांगी है क्यातुम अपना काम करो और मुझे व्यर्थ तंग ना करो।”

मगर चिड़िया चुप न हुई और उसने फिर कहा “अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो अपने लिए एक आलीशान घर बनाती और मज्जे से वहां रहती”

बन्दर ने उसे एक बार फिर घुर्र कर  देखा और चुप रहने को कहा। 

चिड़िया फिर भी कुछ न कुछ बोलती रही जिस से  बन्दर पूरी तरह चिड़ गया। क्रोध में आकर बन्दर ने चिड़िया के घोंसले को तोड़-फोड़ डाला जिसमें चिड़िया अपने परिवार के साथ ख़ुशी से रहती थी। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पढाती है।  इस कहानी से भी  हमे यह शिक्षा मिलती है की हमें हर किसी को उपदेश नहीं देना चाहिये। किसी मूर्ख को दी गयी शिक्षा का फल कई बार उल्टा निकल सकता है।

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8. Result of Treason (मित्र-द्रोह का फल )

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार किसी नगर में दो मित्र रहते थे जिनके नाम थे  धर्मबुद्धि और पापबुद्धि। धर्मबुद्धि व्यापर में बहुत तेज़ था और पापबुद्धि एक दम निकम्मा। 

एक बार पापबुद्धि ने अपने दोस्त धर्मबुद्धि को सुझाव दिया की उन दोनों को मिलकर धन कमाने के लिए किसी दूसरे देश चले जाना चाहिए।  धर्मबुद्धि उसकी बात मन गया। 

दोनों मित्र बहुत सारा सामान लेकर एक नए शहर के लिए रवाना हो गए और कड़ी मेहनत कर उन्होंने बहुत सारा धन इकठ्ठा कर लिया। अंत: दोनों अपने गाँव  की तरफ वापिस चल पड़े।

गाँव के निकट पहुँचने पर  पापबुद्धि  ने धर्मबुद्धि को कहा “मुझे लगता है हमें इतना सारा धन गांव नहीं ले जाना चाहिए।  लोग हमसे ईर्ष्या करेंगे और हो सकता है कोई चोर ही चोरी करने की न कोशिश करे। काफी धन हम यहीं कहीं किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा देते हैं और कुछ दिन बाद जरूरत पड़ने पर निकल कर ले जायेंगे।”

धर्मबुद्धि ने पापबुद्धि  के विचार में अपनी सहमति जताई। वहीं किसी सुरक्षित स्थान पर दोनों ने गड्ढा खोदकर अपना सारा कमाया धन दबा दिया तथा घर की ओर प्रस्थान कर गये।

कुछ दिन बाद, मौका देखकर एक रात पापबुद्धि ने वहाँ गाड़े सारे धन को चुपके से निकालकर अपने पास छुपा लिया।

अगले ही दिन पापबुद्धि धर्मबुद्धि के पास गया और उसने कहा “भाई, मेरा परिवार बड़ा है तो मुझे धन की कुछ आवश्यकता आन पड़ी है। चलो हम कुछ और धन निकल कर ले आएं “

धर्मबुद्धि तैयार हो गया।  पर जब उन्होंने धन निकालने के लिए गद्दा  खोदा तो वहां खली बर्तन तो मिला पर धन का कुछ अता पता न लगा।  

पापबुद्धि ने तुरंत रोना शुरू कर दिया और धर्मबुद्धि पर धन चुराने का इल्जाम लगाया। दोनों लड़ते-झगड़ते हुए न्यायाधीश के पास पहुँच गए।

न्यायाधीश के सम्मुख दोनों ने अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत किया। न्यायाधीश को सत्य का पता लगाने के लिए अभी कोई तरकीब समझ नहीं आ रही थी की तभी पापबुद्धि ने कहा कि गड्डे के पास वाले वृक्ष ही सच बता सकते हैं।  न्यायधीश ने यह बात मान ली। 

रात में पापबुद्धि ने अपने पिता को पास के एक सूखे हुए पेड़ के खोखले में बैठा दिया और बोल दिया की सब पूछा जाये तो कह दें की चोर धर्मबुद्धि है। 

न्यायधीश ने वहां जा कर जब पूछा तो आवाज आई कि चोरी धर्मबुद्धि ने की है।

तभी धर्मबुद्धि ने पेड़ के नीचे आग लगा दी। पेड़ जलने लगा और उसके साथ ही पापबुद्धि का पिता भी। थोड़ी देर में पापबुद्धि का पिता आग से झुलसा हुआ उस वृक्ष की जड़ में से निकला और सबको  सच्चाई का पता चल गया।

न्यायाधीश ने पापबुद्धि को कड़े दंड की सजा दी और धर्मबुद्धि को उसका पूरा धन दिलवा दिया। 

Moral : पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है की सच्चे रास्ते से ही धन कामना चाहिए और लालच नहीं करना चाहिए।  दूसरे के हिस्से पर नज़र रखने से अपना ही निकसान होता है।   

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9. Foolish Heron and The Weasel (मूर्ख बगुला और नेवला)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

किसी जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसके खोल में कुछ बगुले रहते थे। उसी पेड़ की जड़ में एक साँप भी रहता था । वह बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को मौका देख कर खा जाता था।

उनमें से एक बगुला साँप द्वारा अपने बच्चों के बार-बार खाये जाने पर बहुत दुःखी था। एक दिन वह निराश हो कर नदी के किनारे अपना मन हल्का करने के लिए अकेले जा बैठा।

उसे इतना दुखी  देखकर, उस नदी में रहने वाला एक केकड़ा पानी से निकल कर बहार आया और उससे बोला, “क्या बात है दोस्त, तुम इतने उदास क्यों हो?”

बगुले ने कहा – “भाई, बात यह है कि जिस पेड़ पर मैं रहता हूँ उस की जड़ में एक साँप भी रहता है और वह हमारे बच्चों को बार-बार खा जाता है । मुझे इस मुश्किल से बचने का कोई उपाय  नहीं सूझ रहा है की इस साँप से कैसे छुटकारा पाया जाए । तुम्हें कोई उपाय सूझ रहा हो तो बताओ।”

केकड़े ने मन में सोचा, ’यह बगला हमेशा से मेरा दुश्मन रहा है, तो इसे ऐसा उपाय बताऊंगा जिससे साँप के साथ-साथ इसका भी नाश हो जाय”

यह सोचकर केकड़ा  बोला  “मित्र एक काम करो, मांस के कुछ टुकडे़ लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो । इसके बाद बहुत से टुकड़े उस बिल से शुरु करके साँप के बिल तक बखेर दो । नेवला उन टुकड़ों को खाता-खाता साँप के बिल तक आ जायगा और वहाँ साँप को देखकर उसे भी मार डालेगा ।”

बगुले ने ऐसा ही किया । नेवले ने साँप को तो खा लिया किन्तु साँप के बाद उस वृक्ष पर रहने वाले बगुलों को भी खा डाला ।

बगुले ने केकड़े के दिए हुए उपाय के बारे में तो सोचा, किन्तु उसके अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे और उसे अपनी मूर्खता का फल मिला। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से हमे यह सीख मिलती है की किसी भी दी गयी सलाह पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए।  हमे किसी भी काम को करने से पहले उसके सही या गलत परिणाम अच्छे से सोच लेने चाहियें ।

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10. Tit for Tat (जैसे को तैसा)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है। 

एक नगर में जीर्णधन नाम का एक व्यापारी रहता था। उसे व्यापर में काफी नुक्सान हुआ और उसका सब कुछ लूट गया।  फिर उसने दूसरे शहर जा कर दुबारा से काम करने की सोची।  पास तो कुछ बचा नहीं था, बस एक मन भर लोहे की तराजू थी जो उसने एक सेठ के पास धरोहर रख दी।  

कुछ देर बाद विदेश से वापिस आने पर उसने सेठ से अपनी तराजू वापिस मांगी तो सेठ के मन में लालच आ गया।  उसने कहा की तराजू तो चूहे खा गए। 

व्यापारी सब समझ गया पर अब लड़ने से कोई फायदा नहीं था। उसने कहा “ठीक है सेठ जी, अगर तराजू चूहे खा गए तो आपकी तो इसमें कोई गलती नहीं हुई। अब में नदी में स्नान करने जा रहा हूँ, तुम अपने लड़के धनदेव को भी मेरे साथ भेज दो, वह भी नाहा आएगा। “

सेठ व्यापारी की सज्जनता से बहुत प्रभावित था तो उसने अपने लड़के धनदेव को उसके साथ भेज दिया।

व्यापारी ने सेठ के लड़के को एक गुफा में बंद कर दिया और गुफा के द्वार पर एक बड़ी सी चट्टान लगा दी। उसके बाद वह सेठ के पास लौट आया। 

सेठ ने पूछा, ‘मेरा लड़का कहाँ रह गया?”

इस पर व्यापारी ने उत्तर दिया “उसे तो चील उठा कर ले गई”

सेठ ने गुस्से में कहा “ऐसा भी कभी होता है की चील लड़के को उठा ले जाये”

दोनों न्याय पाने के लिए  राजदरबार पहुंचे । सेठ ने व्यापारी पर अपने पुत्र के अपहरण का आरोप लगाया।

न्यायाधीश ने व्यापारी से कहा, “सच सच बताओ, सेठ का लड़का कहाँ है?”

इस पर व्यापारी ने कहा  ‘उसे तो चील उठा कर ले गई”

न्यायाधीश ने कहा, ‘तुम झूठ बोलते  हो। इतने बडे लड़के को एक चील कैसे उठाकर ले जा सकती है?’

इस पर व्यापारी  ने कहा, ‘यदि मेरा मन भर का तराजू चूहे खा सकते हैं तो चील भी लड़के को उठा कर ले जा सकती है।” 

न्यायाधीश ने इस बार सेठ से पूछा, “यह सब क्या मामला है सेठ जी?’ 

अंततः सेठ ने स्वयं सारी बात राजदरबार में बता दी। न्यायाधीश ने व्यापारी को उसका तराजू वापिस दिलवाया और सेठ का लड़का उसे वापस मिल गया।

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की लालच के वश में दूसरे का हक़ मरने वाले का सर हमेशा नीचा होता ही  है। 

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11. A Foolish Friend (मूर्ख मित्र)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है।  एक राजा ने अपने राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रखा हुआ था । वह बन्दर राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था। राजा की आज्ञा से अन्तःपुर में भी वह बन्दर बिना किसी दरबारी के रोके आ जा सकता था ।

एक दिन जब राजा सो रहा था तो बन्दर वहीँ बैठा उसको पन्खा  झल रहा था।  अचानक बन्दर ने देखा की एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी। पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी और थोड़ी ही देर में वापिस उड़कर फिर वहीं बैठी जाती।

बन्दर को बहुत क्रोध आ गया। उसे फर्क थी की एक मक्खी की वजह से कहीं उसके मालिक की नींद ख़राब न हो जाए।  उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली।  और इस बार जैसे ही मक्खी राजा की छाती पर बैठी तो उसने पूरी तकत से मक्खी पर तलवार का हाथ छोड़ दिया ।

मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की छाती के तलवार की चोट से दो टुकडे़ हो गई और राजा ने वहीँ प्राण त्याग दिए। 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है की विद्वान शत्रु की अपेक्षा मूर्ख मित्र ज़्यादा खतरनाक होता है।  

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12. Crows and The Wicked Snake (कौवे और दुष्ट सांप)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्रभेद भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है। किसी जंगल में एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसकी खली खोल में एक कौवा और कौवी का जोड़ा रहता था। उनके नजदीक ही एक दुष्ट सांप ने भी अपना बिल बना रखा था। 

सांप कौवा – कौवी के अण्डों में से बच्चे निकलने से पहले ही उन्हें खा जाता था। इससे दोनों बहुत दुखी रहने लगे और एक बार उदास हो कर उसी पेड़ के पास रहने वाले एक गीदड़ से अपने मन का सारा हाल बताने लगे। कौवा – कौवी ने उस गीदड़ से सलाह मांगी की इस मुसीबत से कैसे छुटकारा पाया जाये। 

गीदड़ ने उन्हें समझाया की चतुराई से ही इस मुसीबत का हल निकलना पड़ेगा क्यूंकि उनका शत्रु बहुत शक्तिशाली है। 

फिर कुछ सोच कर गीदड़ ने कौवे से कहा “तुम एक काम करो। राजमहल से रानी का कंठहार उठाकर सांप के बिल के पास गिरा दो।  जब सैनिक कंठहार ढूंढ़ते आएंगे तो सांप से खुद ही निपट लेंगे। “

दूसरे ही दिन कौवा ने रानी के अंत:पुर में घुस कर उसका मेज़ पर रखा हार उठा लिया।  जब रानी ने यह देखा तो सिपाहियों को कौवे का पीछा करने को कहा।  कौवा ने हार ला कर सांप की बिल के पास फेंक दिया।  सांप ने हार देखा तो उस पर फन फिला कर बैठ गया। 

जैसे ही सिपाही वहां पहुंचे तो उन्होंने सांप को लाठियों से पिट डाला और हार ले कर चले गए।

उस दिन के बाद से कौवा – कौवी और उनके अण्डों को फिर किसी सांप ने नहीं खाया।

Moral : पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से भी हमें यह शिक्षा मिलती है की शत्रु को प्राजित करने के लिए बक से बुद्धि कहीं अधिक ताकतवर सिद्ध होती है।

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13. The Hermit and The Mouse (साधु और चूहा)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्र सम्प्राप्ति भाग पर आधारित है।

दक्षिणी भारत में महिलरोपयम नाम  का एक शहर था जिससे थोड़ी दूर महादेवी का  एक बहुत पुराणा मंदिर था।  मंदिर की देख रेख ताम्रचूड़ नाम का एक साधु करता था। वह नगर से भिक्षा मांग  कर भोजन कर लेता और जो कुछ बचता उसे एक पात्र में डालकर एक खूंटे पर टांग देता थे।  उसी बचे हुए खाने में से कुछ गरीबों को दे कर वह मंदिर की साफ़ सफाई और लिपाई पुती का काम करवाता था।

उसी आश्रम में एक चूहों का दाल अपनी बिल बनाकर रहता था। उस दाल का प्रमुख चूहा बहुत ही शातिर था और हर रोज साधु के पात्र में से कुछ न कुछ भोजन चुराकर सब चूहों में बाँट देता।

ताम्रचूड़ साधु को जब एहसास हुआ की एक चूहा उसका खाना चोरी कर रहा है तो वह एक बांस ले आया और पूरी रात उससे खाने के पात्र को खटखटाने लगा। चूहा भी बांस से पिटे जाने के डर से पास नहीं जाता था।

एक दिन उस मंदिर में एक और सन्यासी आये। ताम्रचूड़ ने उनका बहुत सत्कार किया और दोनों में खूब ज्ञान की बातें दिन भर चलती रहीं।  पर जब रात हुई तो ताम्रचूड़ ने फिर से पात्र को बांस से खटखटाना शुरू कर दिया।  यह देख कर सन्यासी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने ताम्रचूड़ से कहा “तुम मेरा अपमान कर रहे हो। अगर तुम्हें भिक्षा पात्र में जियादा दिलचस्पी है तो मैं अभी कहीं और चला जाता हूँ।”

इस पर ताम्रचूड़ ने उनसे माफ़ी मांगी और चूहे की सारी कहानी बताई। 

यह सुन कर सन्यासी ने कहा “जरूर ही इस चूहे के पास बहुत सारा धन है जिसके कारन इसमें इतना आत्मविश्वास आ  गया है। तुम एक फावड़ा ले आओ तो हम इसका पीछा कर इसका सारा खज़ाना हटा देते हैं।”

चूहे ने भी यह बात सुन ली थी और  उसे लगा की बिल को बचाना जरुरी है।  इस लिए जब वह अगली बार खाना चुराने गया तो सीधा वापिस न जा कर वह अपनी टोली के साथ एक नए रस्ते पर चल पड़ा। 

उस नए रस्ते पर एक बिल्ली मिली और चूहों के दाल को देख कर उनपर टूट पड़ी।  बहुत से चूहे घायल हो गए और अपनी जान बच्चा कर भागे।  उधर ताम्रचूड़ और सन्यासी भी चूहों के पद्चिन्हों का पीछा करते हुए बिल तक पहुँच गए और उन्होंने बिल खोदकर वहां जमां सारा खज़ाना निकाल लिया। 

यह सब देख चूहे का सब आत्मविश्वास जाता रहा। फिर भी उसने फैसला किया कि वो आज रात फिर से खाना चुराएगा। लेकिन जब उसने पात्र तक पहुँचने की कोशिश की, तब वह सीधा जमीन पर  नीचे आ गिरा। अब वह एक साधारण चूहा ही रह गया था।

उसी समय साधु ने भी उस पर हमला किया। किसी तरह चूहे ने अपनी जान बचायी और भागने में कामयाब रहा। 

बाकी सब चूहों ने उसपर बिल्ली के रास्ते जाने का आरोप लगाया और उसे दल से निकाल दिया।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से हम यह सीखते हैं की संसधानों से ही सबअद्भुत शक्तियों और आत्मविश्वास आता है और जब वह हमसे छीन जाये तो आपकी योग्यता भी काम हो जाती है।  

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14. The Unlucky Weaver (अभागा बुनकर)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्र सम्प्राप्ति भाग पर आधारित है।

एक बार की बात है, एक नगर में सोमिलिक नाम का जुलाहा रहता था। वह अपने काम में माहिर था, पर नगर में सबसे   रंगीन कपड़े बनाकर भी उसका मुश्किल से ही गुजर बसर होता था। अन्य जुलाहे सादा कपडा बनकर भी देखते देखते धनी हो गये थे।

उन्हें देखकर एक दिन सोमिलिक ने अपनी पत्नी से कहा “मामूली कपडा बुनने वाले जुलाहों ने भी कितना धन कमा लिया है और कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं। मैं इतने सुन्दर वस्त्र बनाने के बाद भी आज तक निर्धन ही हूँ। लगता है यह नगर नगर मेरे लिए भाग्यशाली नहीं है; अतः मुझे विदेश जाकर धन कमाने का प्रयास करना चाहिए ”  

सोमिलिक की पत्नी ने कहा,  “विदेश  में धन कमाना बहुत कठिन होता है। अगर भाग्य में धन मिलना होगा तो स्वदेश में ही मिल जायेगा और अगर नहीं मिलना हो तो हाथ आया सबकुछ भी लुट जाता है।अतः यहीं रहकर काम करते रहिये, भाग्य में लिखा होगा तो यहीं धन की प्राप्ति हो जायगी ।”   

सोमलिक यह सुन कर बोला -“भाग्य की बातें तो कमजोर लोग करते हैं जो मेहनत से डरते हों। लक्ष्मी हमेशा परिश्रम से प्राप्त होती है। मैं भाग्य की राह देखने की  जगह, विदेश जाकर जतन करूँगा और धन कमा कर दिखाऊंगा।” 

यह कहकर सोमलिक  वर्धमानपुर चला गया । वहां तीन वर्षों में अपनी मेहनत से  ३०० सोने की मुहरें लेकर वह घर की ओर चल पड़ा । रास्ता लम्बा  था तो आधे रास्ते में ही दिन ढल  गया और शाम हो चली । आस-पास कोई घर नहीं था । उसने एक मोटे वृक्ष की शाखा के ऊपर चढ़कर रात बितायी ।

सोते-सोते उसे एक स्वप्न आया जिसमें दो भयंकर दिखने वाले पुरुष आपस में बात कर रहे थे।

एक ने कहा – “हे पौरुष ! तुम्हें क्या मालूम नहीं है की सोमलिक के पास  भोजन-वस्त्र से अधिक  धन नहीं रह सकता, तब तुमने इसे ३०० मुहरें क्यों दीं ?”

दसूरा बोला – “हे भाग्य  ! मैं तो प्रत्येक मेहनत करने वाले को एक बार उसका फल देता ही हूँ। उस फल को उसके पास रहने देना या नहीं रहने देना तुम्हारे हाथ में है।”

स्वप्न के बाद सोमलिक  की नींद खुली तो देखा की मुहरों का पात्र खाली था। इतने कष्टों से इकठे किये धन के इस लुप्त हो जाने से सोमलिक बडा दुखी हुआ और सोचने लगा की वापिस जाकर सबको क्या मुंह दिखाऊंगा।  यह सोचकर वह फिर से वर्धमान पुर वापस आ गया ।

इस बार उसने दिन-रात घोर परिश्रम करके वर्ष भर में ही ५०० मुहरें जमा कर ली। उन्हें लेकर वह फिर से घर की ओर चल पड़ा। इस बार फिर आधे रास्ते में रात हो गई पर इस बार वह सोने के लिए ठहरा नहीं और चलता ही रहा। पर चलते-चलते  उसने फिर उन दोनों—पौरुष और भाग्य — को  पहले की तरह बात-चीत करते सुना ।

भाग्य ने फिर वही बात कही -“हे पौरुष  ! क्या तुम्हें मालूम नहीं की सोमलिक के पास भोजन वस्त्र से अधिक धन नहीं रह सकता । तब उसे तुमने ५०० मुहरें क्यों दीं ?”

पौरुष ने वही उत्तर दिया  —-“हे भाग्य  ! मैं तो प्रत्येक व्यवसायी को एक बार उसका फल दंगूा ही, इससे आगे तुम्हारे अधीन है की उसके पास फल रहने दे या छीन ले।”

इस बात-चीत के बाद सोमलिक  ने जब अपनी मुहरों की गठरी देखी तो वह मुहरों से खाली  थी । 

इस तरह दो बार खाली हाथ रह जाने से सोमलिक  का मन बहुत दुखी हुआ ।

उसने सोचा की इस धन-हीन जीवन से तो मृत्यु ही अच्छी है।

यही  सोच कर उसने पास के एक वृक्ष की टहनी से रस्सी बाँधी और लटकने को तैयार हो गया।

पर तभी एक आकाश-वाणी हुई—“सोमलिक ! यह गलती मत करो। मैंने ही तुम्हारा धन चुराया है । तुम्हारे भाग्य  में भोजन-वस्त्र मात्र से अधिक धन नहीं लिखा। व्यथा के धनसंचय में अपनी शक्तियां नष्ट मत करो । घर जाकर सुख से रहो। तुम्हारे साहस से मैं प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहे एक वरदान मांग लो । मैं तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी करूँगा  ।” 

सोमलिक के मन में तो बस धन की चाह थी तो उसने फिर कहा, “मुझे वरदान में बहुत सारा धन दे दो।” 

अदृश्य देवता ने फिर कहा,  “धन का तुम्हें कोई उपयोग नहीं होगा क्यूंकि वह तुम्हारे भाग्य में नहीं है। भोग रहित धन को लेकर क्या करोगे?” 

सोमलिक तो धन का तरस रहा था, वह बोला, “भोग हो या न हो, मुझे धन ही चाहिए । बिना उपयोग के भी धन की बडी कीमत है। संसार में वही पूज्य माना जाता है, जिसके पास धन हो।”  

सोमलिक की बात सुनने के बाद देवता ने कहा, “अगर तुम्हारी धन की इच्छा इतनी ही प्रबल है तो तुम फिर से वर्धमानपुर चले जाओ। वहां दो बनियों  के पुत्र हैं – एक गुप्तधन, दूसरा उपभुक्त धन। इन दोनों प्रकार के धनों का स्वरुप  जानकर तुम वापसी में किसी एक का वरदान मांगना। यदि तुम उपभोग की योग्यता के बिना धन चाहेगा तो तुम्हें गुप्त धन दे दंगूा और यदि खर्च के लिए चाहेगा तो उपभुक्त धन दे दूंगा।” 

यह कहकर देवता लुप्त हो गए ।

सोमलिक उनके आदेश के अनुसार  फिर वर्धमानपुर  पहुंचा। शाम हो गई थी । पूछता-पूछता वह गुप्तधन के घर पर चला  गया । घर पर आये अतिथि का किसी ने सत्कार तक नहीं किया  । इसके विपरीत  उसे भला -बुरा कहकर गुप्तधन और उसकी पत्नी ने घर से बहार  धकेलना चाहा। पर सोमलिक संकल्प का पक्का था और सबकी मर्ज़ी के खिलाफ वह घर में घुसकर जा बैठा। भोजन के समय उसे गुप्तधन ने रूखी-सूखी रोटी दे दी । उसे खाकर वह वहीं सो गया ।

स्वप्न में उसने फिर वही दोनों देव दिखे। वे बातें कर रहे थे। एक कह रहा था — “हे पौरुष  ! तूमने गुप्तधन को भाग्य से इतना अधिक धन क्यों दे दिया  की उसने सोमलिक को भी रोटी दे दी ।”

पौरुष  ने उत्तर दिया —-“मेरा इसमें दोष नहीं । मुझे पुरुष के हाथों धर्म -पालन करवाना ही है, उसका फल देना तुम्हारे अधीन है ।” 

दुसरे दिन गुप्तधन बीमार हो गया और उसे उपवास करना पडा । इस तरह उसकी क्षतिपूर्ति हो गई । 

सोमलिक अगले दिन सुबह उपभुक्त धन के घर गया। वहां के घर वालों ने भोजन आदि द्वारा उसका सत्कार कराया । सोने के लिए सुन्दर बिस्तर दिए।

सोते-सोते उसने फिर से वही दोनों  देवों को सुना। एक कह रहा था —“हे पौरुष ! इसने सोमलिक का सत्कार करते हुए बहुत धन खर्च कर दिया  है । अब इसकी क्षतिपूर्ति  कैसे होगी ?” 

दसूरे ने कहा —“हे भाग्य  ! सत्कार के लिए  धन व्यय करवाना मेरा धर्म था, इसका फल देना तुम्हारे अधीन है ।” 

सुबह होने पर सोमलिक  ने देखा राज-दरबार से एक राज-पुरुष  राज -प्रसाद के रूप  में धन की भेंट  लाकर उपभुक्त धन को दे रहा था। 

यह देखकर सोमलिक  ने विचार किया  की  “यह संचय-रहित उपभुक्त धन ही गुप्तधन से श्रेष्ठ है । जिस धन का दान कर दिया जाए  या अच्छे कार्यों  में व्यय कर दिया  जाये वह धन संचित धन की अपेक्षा बहुत अच्छा होता है। ” 

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। यह कहानी हमें सिखाती है की  गुप्त धन से उपभोकहत धन अच्छा होता है जो किसी सिद्ध कार्य में काम आये।

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15. Elephants and The Clever Rabbit (हाथी और चतुर खरगोश)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

एक वन में चतुर्दंतनाम का महाकाय हाथी रहता था जो अपने हाथी दल  का मुखिया भी था। बरसों तक सूखा पडने के कारण वहा के सब झील और तालाब सूख गये और वृक्ष भी मुरझा  गए। सब हाथियों ने मिलकर अपने राजा चतुर्दंत को कहा की अब भूख प्यास से हमारे बच्चे मरने लगे हैं इसलिए जल्दी  ही किसी बड़े तालाब  की खोज करनी चाहिए।

कुछ देर सोचने के बाद चतुर्दंत ने कहा, “मुझे एक ऐसे तालाब का पता है जो पाताल गंगा के जल से सदा भरा रहता है। हमें वहीँ चलना चाहिए “

बहुत दिनों की लम्बी यात्रा के बाद सब हाथी उस तालाब तक पहुंचे। तालाब में खूब पानी था। सब हाथियों ने खूब पानी की प्यास मिटाई और पूरा दिन पानी में स्नान कर वह वापिस चलने हो हुए। 

तालाब के चारों ओर खरगोशों के अनगिनत बिल भी थे और उन बिलों के कारन आस पास की जमीन नरम हो गई थी।  हाथियों के पैरों से वे सब बिल टूट-फूट गए । बहुत से खरगोश भी हाथियों  के पैरों से कुचल गये।

हाथियों  के वापस चले जाने के बाद उन बिलों में रहने वाले खरगोशों ने एक बैठक की और सोचा गया की आगे से इस मुसीबत से कैसे बचा जाये। सब खरगोशों ने मिलकर यह अनुमान लगाया की आसपास सूखा पड़ जाने कारन ये हाथी अब हर रोज इसी तालाब  में आया करेंगे और उनके बिलों  को अपने पैरों  से रौंदा करेंगे। इस प्रकार दो चार दिनों  में ही सब खरगोशों का नाश हो जायगा ।

एक खरगोश ने सुझाव दिया, “नीति यही कहती है की एक दल से लिए एक व्यक्ति का, एक गांव के लिए एक दल का और एक देश के लिए एक गांव का परित्याग करना ही उचित होता है।  इसलिए अब हमें ही यह जगह छोड़ कहीं और चले जाना चाहिए।” 

पर बाकि खरगोशों ने अपने पूर्वजों की धरती से भाग जाने से साफ़ मना कर दिया। 

कुछ ने उपाय सुझाया के खरगोशों की ओर से एक चतुर दूत हाथियों के नेता के पास भेजा जाये जो वहां जा कर हाथियों से यह कहे की चन्द्रमा में जो खरगोश बैठा है, उसने हाथियों  को इस तालाब  में आने से मना किया है। उम्मीद थी की चन्द्रमा के खरगोश की बात को वह मान जायेंगे।

बहुत विचार  के बाद लंबकर्ण नाम के खरगोश को दूत बना कर हाथियों के पास भेजा गया । लंबकर्ण हाथियों की राह में बैठ गया और जैसे ही हाथी तालाब की तरफ आये तो वह बोलै “यह तालाब चाँद का अपना तालाब  है और चाँद ने हाथियों का यहाँ आना वर्जित कर दिया है।”

गजराज ने पूछा “लेकिन यह चाँद कहाँ है जिसका यह तालाब है?”

लंबकर्ण ने जवाब दिया ” चाँद इसी तालाब में है और तुम्हारे किये उत्पात पर शोक जताने आया हुआ है”

गजराज ने कहा “तुम मुझे चाँद के तालाब में दर्शन करा दो, में चुपचाप यहाँ से वापस चला जाऊंगा। “

लंबकर्ण अकेला गजराज को ले कर तालाब की तरफ चल पड़ा। तालाब  में चाँद की छाया पड रही थी । गजराज ने उसे ही चाँद  समझ कर प्रणाम किया और चुपचाप वापस लौट गया ।

उस दिन के बाद कभी  हाथियों का दल तालाब के किनारे नहीं आया ।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से भी हमे दो बहुत ज़रूरी बातें सीखने को मिलती हैं। पहली तो यह की चतुराई और सूझ बूझ से हम किसी भी मुश्किल का हल ढूंढ सकते हैं। और दूसरी की हमें हमेशा अपना नेता बड़ी सूझ बुझ से ही चुनना चाहिए।  

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16. The Pigeon and The Mouse (कबूतर और चूहा)

यह कहानी पंचतंत्र के मित्र सम्प्राप्ति भाग पर आधारित है। 

दक्षिण भारत में महिलारोप्य नाम का एक नगर बसा हुआ था।  वहां एक विशाल से वृक्ष पर एक कौवा रहता था।  एक बार जब वह अपना खाना ढूंढ़ने के लिए जाने लगा तो उसने एक शिकारी को उसी वृक्ष की तरफ आते देखा।  वह समझ गया की शिकारी आज पक्षियों को पकड़ने आया है।

उसने जल्दी से अपने बाकि साथियों को शिकारी के बारे में बता दिया और कह दिया की शिकारी जब दाना डाले तो कोई खाने की गलती मत करे वरना जाल में फस जायेंगे। बाकि सब कौवों ने उसकी बात मान ली और शिकारी ने जब बीज डाले तो एक भी कौवा उन्हें खाने नहीं गया। 

तभी आकाश में कबूतरों का एक दल निकला। बीज देख कर उन्होंने अपनी भूख मिटने की सोची।  कौवे ने तुरंत कबूतरों के सरदार को आगाह किया की वहां जाल बिछा है पर कबूतर बहुत भूखे थे और उन्होंने कौवे की बात यह सोच कर नज़रअंदाज़ कर दी की कौवा यह सारा खाना अपने दोस्तों के लिए बचाना चाहता है। 

पर जैसे ही कबूतर नीचे उतरे तो शिकारी के जाल में फास गए।  पर अब पछताने से क्या हो सकता था। 

फिर कबूतरों के सरदार ने बाकि कबूतरों को बेजान हो कर गिर जाने को कहा जिससे शिकारी को लगे की कबूतरों से अब कोई खतरा नहीं रहा।  जैसे ही कबूतर गिरे तो शिकारी ने अपना जाल समेटा और वापिस चलने लगा।  तभी कबूतरों के सरदार ने इशारा किया और सब कबूतर एक साथ पंख मारते हुए जाल समेत उड़ गए।  शिकारी के हाथ न तो कोई कबूतर आया और उसे अपने जाल से भी हाथ धोना पड़ा। 

कबूतरों का सरदार एक चूहों की टोली के सरदार का मित्र था।  वह सब सिध्धे चूहों के पास पहुँच गए।

साडी बात सुन कर चूहों के सरदार ने अपनी टोली के साथ तुरंत जाल काट दिया और सब कबूतर आज़ाद हो गए।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से भी हम यह सिखाते हैं की किसी की सलाह को बिना सोचे समझे झुठलाना नहीं चाहिए और दूसरे की सही मित्र ही आपके मुश्किल वक़्त में काम आता है।

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17. Goat, Priest and Three Thieves (बकरा, ब्राह्मण और तीन ठग)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

एक नगर में मित्रशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता है।  एक बार माघ के महीने में वह अपने पड़ोस के गांव गया और वहां किसी यजमान से कहा “यजमान, मैं आने वाली अमावस की रात एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहा हूँ और उसके लिए आपसे एक पशु दान में माँगने आया हूँ। “

यजमान बहुत दयालु था और उसने एक हष्ट-पुष्ट बकरा ब्राह्मण को दे दिया जिसे अपने कन्धों पर लटका ब्राह्मण वापिस अपने घर की तरफ चल पड़ा।

रास्ता काफी सुनसान था। आगे जाने पर रास्ते में उसे तीन ठगों ने देख लिया। ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर तीनों ने उसे हथियाने की योजना बनाई।

उनमें से पहला ठग वेश बदल कर ब्राह्मण के सामने आया और बोला  “ब्राह्मण महाराज, यह तुम्हारी बुद्धि को क्या हो गया है ? ब्राह्मण हो कर एक गधे को कन्धों पर लटकाये जा रहे हो”

ब्राह्मण के क्रोध में उत्तर दिया “मुर्ख, अंधे हो गए हो क्या जो इस पशु को गधा कह रहे हो?”

यह कह कर ब्राह्मण आगे अपने रास्ते पर निकल गया।

कुछ दूर चलने पर दूसरा ठग वेश बदल कर उसके सामने आया और बोला “ब्राह्मण जी, यह क्या अनर्थ कर रहे हो? एक गधे को कन्धों पर लटकाये घूम रहे हो?”

ब्राह्मण ने फिर इसे भी गुस्से से बोला “अंधे हो क्या तुम जो इस पशु को गधा बोल रहे हो?”

ब्राह्मण फिर थोड़ी दूर और आगे गया तो तीसरा ठग वेश बदल कर उसके सामने आ गया और कहा “छी  छी ब्राह्मण जी , यह क्या कर दिया ? एक गधे को अपने कन्धों पर उठा लिया? गधों को तो छूने से भी स्नान करना पड़ता है। इसे यहीं छोड़ दो की इससे पहले कोई और देख ले “

तीसरी बार सुनते ही ब्राह्मण को यकीन  हो गया की कुछ तो गड़बड़ है और उसने पशु को वहीँ आज़ाद कर दिया और वहां से निकल गया।

इधर तीनों ठगों ने उस बकरे को ले जाकर खूब दावत उडाई।

Moralपंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से हमे यह सीख मिलती  है की किसी  झूठ को बार-बार बोलने से वह  सच की तरह लगने लगती है। अतः अपने दिमाग से काम लेना और अपने पर पूर्ण विश्वास रखना बहुत जरूरी है।  

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18. The Brahmin and The Snake (ब्राह्मण और सांप)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

किसी नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसका छोटा सा खेत था जिससे उसके परिवार का बस गुजर बसर ही होता था।  एक दिन बहुत गर्मी पड़ रही थी तो वह अपने खेत के पास वाले पेड़ की ठंडी छाया में जा कर बैठ गया।  जैसे ही वह जमीन पर आराम करने के लिए लेटा, तो उसे पास की बिल के ऊपर एक सांप को फ़न फिलाये बैठे देखा। 

उसको देखकर ब्राह्मण ने सोचा की यह सांप जरूर मेरे क्षेत्र का देवता है और क्यूंकि मैंने कभी इसकी पूजा नहीं करी, तभी मेरे खेत की फ़सल अच्छी नहीं होती। उसने निष्चय किया की आज से ही वह उस सांप की पूजा करा करेगा। 

उसके बाद वह जल्दी से उठा और दौड़ कर गांव से दूध लेकर आया।  दूध को उसने एक मिट्टी के बरतन में डाला और बिल के समीप जाकर रख दिया।

वह बोला , “हे नाग देवता,आज तक अज्ञानतावश मैंने कभी आपकी पूजा अर्चना नहीं की।  मुझे इस गलती के लिए माफ़ करें और मेरा चढ़ावा स्वीकार करें।

यह कह कर हरिदत्त वहां से अपने घर वापिस लौट गया। अगले दिन जब वह अपने खेत पर आया तो सब से पहले वह सांप की बिल के पास गया। उसने देखा की जिस बरतन में उसने दूध रखा था उसमें अब एक स्वर्ण मुद्रा पड़ी थी।

उस दिन के बाद यह सिलसिला शुरू हो गया।  वह हर रोज सांप की पूजा करता और उसके लिए दूध रखकर चला जाता। अगले दिन उसको दूध के बर्तन में एक स्वर्णमुद्रा मिलती। देखते ही देखते उसके दिन बदलने लगे। 

एक बार हरिदत्त को किसी काम से नगर से बहार जाना पड़ा।  तो उसने अपने पुत्र को ढूढ़ रखने के लिए आदेश दिया और पिता के कहे अनुसार पुत्र बर्तन में ढूढ़ रख कर चला आया।

दूसरे दिन जब पुत्र पुनः दूध रखने के लिए गया तो उसे भी वहां स्वर्ण मुद्रा रखी हुई मिली।

उसने उस मुद्रा को उठाया और उसके मन में लालच आ गया।  उसने मन ही मन सोचा की  निश्चित रूप से इस बिल के अंदर स्वर्ण मुद्राओं का भण्डार है जिसे उसे एक ही साथ हथिया लेना चाहिए।  यही सोच कर वह सांप के बहार आने का इंतज़ार करने लगा।  जैसे ही सांप  दूध पीने के लिए बाहर निकला  तो उसने सांप पर लाठी का प्रहार किया।

इससे सांप तो नहीं मरा पर अपने ऊपर हुए हमले से क्रुद्ध होकर उसने ब्राह्मण-पुत्र के पैरों पर अपने जेहरीले दांतों से काट लिया जिससे उसकी वहीँ मृत्यु हो गई।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही तरह से जीने का पाठ पढ़ाती है। इस कहानी से भी हमे यह सीख मिलती है की लालच का फल कभी मीठा नहीं होता।  

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19. The Rat’s Wedding (चुहिया का स्वयंवर)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

गंगा नदी के किनारे  एक आश्रम था जहाँ पर योगी मुनि  रहते थे। एक बार जब वह नदी में स्नान कर रहे थे, तभी उनके हाथों में ऊपर से एक चुहिया आ गिरी । उस चुहिया को आकाश मे बाज ले जा  रहा था और बाज के पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई थी । मुनि को उस चुहिया पर दया आ गई।  यह सोच कर की बाकि लोग उनपर हसेंगेतो उन्होंने उस चुहिया को एक कन्या का रूप दे दिया और अपने आश्रम में अपनी बेटी की तरह ले आये । उनकी पत्नी ने भी कन्या बनी चुहिया का सत्कार किया। 

क्यूंकि उनकी अपनी कोई सन्तान नहीं थी , इसलिए मुनि पत्नी ने उसका  लालन पालन  बडे प्रेम से किया  । 18 वर्ष तक वह उनके आश्रम में रही और ज्ञान विद्या ग्रहण की।

जब वह विवाह योग्य अवस्था की हो गई तो पत्नी ने मुनि से उसके लिए एक काबिल वर ढूंढ़ने को कहा। 

अगले ही दिन मुनि ने सूर्यदेव  को बुला लिया और अपनी कन्या से पूछा “पुत्री, क्या तुझे यह त्रिलोक को प्रकाश देने वाला सूर्यदेव  पतिरूप में स्वीकार है?”

कन्या ने उत्तर  दिया “पिताजी ! यह तो आग जैसे गरम है, मुझे यह वर स्वीकार नहीं । इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि ने सूर्यदेव  से पूछा की  वह अपने से अच्छा कोई वर बताये ।

सूर्यदेव ने कहा “मुझ सेअच्छे तो बादल हैं जो मुझे ढककर छिपा सकते हैं।”

अगले ही दिन मुनि ने बदलों के राजा को बुला लिया और अपनी कन्या से पूछा “पुत्री, क्या तुझे यह बदल पतिरूप में स्वीकार है?”

कन्या ने उत्तर  दिया “पिताजी ! यह तो बहुत कला है, मुझे यह वर स्वीकार नहीं । इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि ने बदलों के राजा से पूछा की उससे अच्छा कौन है।

बदलों के राजा ने कहा, “हम से अच्छी वायु है, जो हमें उडाकर  किसी भी दिशा में ले जा सकती है”

मुनि  ने वायु देवता  को बुलाया और कन्या से फिर पुछा।

कन्या ने कहा —-” यह तो बहुत चंचल हैं  हैं। इस से किसी अच्छे वर को बुलाइये।”

मुनि ने वायु देवता  से पुछा की उनसे अच्छा कौन है तो  वायु देवता ने कहा, “मुझ से अच्छा पर्वतराज  है, जो बडी से बडी आाँधी में भी स्थिर रहता है।”

मुनि ने पर्वतराज  को बुलाया  तो कन्या ने फिर  कहा “यह तो  बहुत कठोर और अचल है। इससे अच्छा कोई वर बताइये।”

मुनि  ने पर्वतराज  से पूछा की अपने से अच्छा कोई वर सुझाइये।

तब पर्वतराज  ने कहा —- “मुझसे अच्छा तो चूहा है, जो मुझे तोडकर अपना बिल बना लेता  है।”

मुनि ने तब चूहों के राजा को बुलाया और कन्या से फिर पूछा —- “अब तुम्हें यह मूषकराज स्वीकार हैं?”

मुनिकन्या ने मूषकराज को बडे ध्यान से देखा और अंत: वह बोली “हाँ पिताजी, मुझे यह पसंद हैं “

मुनि  ने अपने तपो बल  से उसे फिर से  चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह  कर दिया। 

Moral:  पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से भी हमे यही सिख मिलती  है की चाहे हम कितना भी बदल जाएँ हमारा मूल स्वभाव हमेशा एक सा रहता है।

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20. The Speaking Cave (बोलने वाली गुफा)

यह कहानी पंचतंत्र के संधि-विग्रह भाग पर आधारित है।

एक घने जंगल में खर-नखर नाम का एक शेर रहता था। एक बार की बात है, वह दिन भर शिकार की तलाश में भटकता रहा, पर कोई शिकार उसके हाथ न लगा। भूख प्यास से उसका गाला सुख रहा था।  थका-हरा वह अभी घुम ही रहा था की उसकी नज़र एक गुफा पर गई। कुछ देर आराम करने के मन से वह उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया और सोचने लगा  की यहाँ जरूर कोई जानवर रहता होगा और रात में वह इसमें अवश्य आएगा। आज मैं उसे ही मारकर अपनी भूख  मिटाऊंगा। 

उस गुफा में एक सियार का वास था जो रात में लौटकर अपनी गुफा पर वापिस आ गया। सियार ने गुफा के द्वार पर अंदर जाते हुए शेर के पैरों के निशान देख लिए। बहुत ध्यान से देखने पर उसे लगा की शेर अंदर तो गया है, पर वापिस बाहर नहीं निकला। वह समझ गया की शेर अभी भी गुफा में छिपा बैठा उसका ही इंतज़ार कर रहा है।

उस चालाक सियार ने तुरंत एक उपाय सोचा। वह गुफा के द्वार के पास ही खड़ा हो गया और उसने वहीँ से के आवाज लगायी “मित्र गुफा, देखो मैं आ गया हूँ।  तुमने मुझे वचन दिया था की मैं आऊंगा तो तुम मुझसे बात करोगी।  अब चुप क्यों हो?”

सियार की पुकार सुन कर शेर ने सोचा “शायद यह गुफा सियार के आने पर बोलती हो और आज मेरे यहाँ होने से चुप है।  इसकी चुप्पी से सियार को खतरे का संदेह हो जायेगा और वह भाग जायेगा।  इसलिए में स्वंय बोलकर सियार को जवाब देता हूँ। “

और इसके साथ की शेर ने एक गरज़ निकली जिसकी आवाज़ से पूरी गुफा हिल गई। 

आवाज सुनते ही सियार समझ गया की पक्का अंदर एक शेर बैठा है और उसकी राह देख रहा है। और वह तुरंत ही वहां से भाग खड़ा हुआ।

और इस तरह सियार ने चालाक  से अपनी जान बचा ली।

Moral: पंचतंत्र की हर कहानी हमें जीवन को सही ढंग से जीने का पाठ पढ़ाती  हैं। इस कहानी से भी हमे यही सीख मिलती  है हमें हमेशा  सतर्क रहकर अपने आस पास की चीज़ों  का ध्यान रखना चाहिए।  सियार ने भी अपनी चतुराई से यह समझ लिया की गुफा में शेर है और अपनी जान बचने में सफल रहा।  

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