Tenali Rama Stories
For Kids

Enjoy reading to hilarious Tenali Rama stories for kids!

Tenali Rama Stories

Who was Tenali Rama?

Tenali Ramakrishna  or Tenali Rama was a poet and King Krishnadevaraya’s advisor. He was well-known for his incredible wit, comedy, and intelligence. He was an Andhra Pradesh-born Telugu poet from the village of Tenali. He was one of the Ashtadiggajas, or the eight poets, of the Vijayanagar ruler Krishnadevaraya’s court.

About Tenali Ramakrishna Stories for Children

Tenali Raman stories all focus on his relationship with the king, as well as his intelligence and problem-solving ability. Tenali Rama stories or tales make excellent bedtime choices for children. The Adventures of Tenali Raman, an animated series produced by Cartoon Network India, is based on these legends that have been passed down since the early 16th century. Furthermore, these iconic Tenali Rama stories were adapted into a comedy drama TV series that aired on Sony SAB and Happy TV Tamil from 2017 to 2020.

Nothing compares to the charm of reading Tanali Rama stories, which is why we’ve compiled a collection of some of our favourites for you. These Tenali Raman stories in Hindi would be a hit with your children if they like stories about handling moral problems.

Read and listen to the funny Tenali Raman stories for kids. This collection of stories by Tenali Raman will have you laughing out loud while also making you appreciate his talent. Learn how Tenali Raman obtained the ability to make people laugh, and how he used that ability to serve King Krishnadevaraya.

Best Tenali Rama Stories In Hindi

Even today, youngsters enjoy Tenali Rama’s wit and wisdom through his stories, which are known as Tenali tales. Tenali Raman’s knowledge and intelligence are highlighted in the following 10 entertaining and engaging stories.

Table of Contents

1. स्वागत है तेनाली राम (Welcome Tenali Rama)

बहुत समय पहले , आंध्र प्रदेश में तेनाली नाम का एक गाँव था।  तेनाली में एक राम नाम का लड़का अपनी  माँ के साथ रहता था।  राम बहुत ही बुद्धिमान लड़का था। 

बड़ा होने पर राम की शादी शारदा देवी नाम की एक लड़की से कर दी गयी।  एक साल बाद शारदा और राम का एक पुत्र भी हुआ। 

अब राम के ऊपर ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ गया।  गाँव में इतने साधन नहीं थे जिस से राम अपने परिवार का पोषण अच्छी तरह करे सके। पर राम ने सुना था की आंध्र प्रदेश की राजधानी विजय नगर में राजा कृष्णदेव राय उसके जैसे बुद्धिमान व्यक्तियों की बहुत इज़्ज़त करते हैं। राम ने सोचा क्यों न एक बार विजय नगर जा कर अपनी किस्मत आज़मायी जाये ?

लेकिन विजय नगर दरबार में जाना इतना आसान नहीं था।

संयोग से विजय नगर दरबार के राजगुरु का तेनाली गाँव में आना हुआ । 

राम को यह एक सुनहरे मौके जैसा लगा। 

राम ने राजगुरु को अपने घर मेहमान बन कर रहने का निमंत्रण दिया।  राम दिन रात राजगुरु की सेवा करता और उनसे सिर्फ एक ही बिनती करता की किसी तरह वह एक बार राम को महाराज कृष्णदेव राय से मिलवा दें। 

एक महीने बाद राजगुरु ने राम से विदा लेते हुए कहा – ” राम।  में तुम्हारी सेवा से बहुत खुश हुआ।  विजय नगर दरबार पहुंच कर जैसे ही मुझे मौका मिलेगा , में तुम्हे वहाँ आने का न्योता भिजवा दूंगा।  “

राम राजगुरु के वादे से बहुत खुश हुआ। 

पर राजगुरु बहुत चालक आदमी था।  इतने दिनों राम के घर रहते रहते उसे समझ आ गया था की राम बहुत बुद्धिमान व्यक्ति है।  अगर इतना बुद्धिमान व्यक्ति दरबार में रहेगा तो राजगुरु की पूछ महाराज के सामने काम हो जाएगी। इसलिए विजय नगर पहुँचाने के बाद राजगुरु ने राम का कभी नाम तक नहीं लिया। 

इधर राम के सब्र का बाँध टूटा जाता था।  महीने बीत गए , पर राजगुरु की तरफ से कोई न्योता नहीं आया।  आस पडोसी राम का मज़ाक उड़ाते और बोलते – ” क्यों राम ? विजय नगर से न्योता नहीं आया ? “

एक दिन राम ने परेशान हो कर खुद ही विजय नगर जाने की ठानी। 

वह अपनी माँ , पत्नी और बच्चे के साथ तेनाली गाँव को छोड़ कर विजय नगर की तरफ निकल गया।  

विजय नगर पहुँच कर राम की आँखों में चमक आ गयी।  बड़ी बड़ी सड़के , बड़े बड़े भवन। राम विजय नगर में हमेशा के लिए रहने का मन बना चुका था। 

अपने परिवार को एक धर्मशाला में रुकवा कर राम राजगुरु से मिलने निकल गया। 

राजगुरु के महल के बहार पहुँच कर कर राम ने चौकीदारों से राजगुरु को अपने आने की खबर देने को कहा।

पर धूर्त राजगुरु ने राम को पहचान ने से मना कर दिया। 

राम को बहुत बुरा लगा।  समय आने पर राम ने राजगुरु से बदला लेने की ठानी।  पर उसके लिए अभी सब से ज़रूरी विजय नगर दरबार में अपनी जगह बनाना था। 

थोड़ा छानबीन करने पर राम को पता चला की महाराज के दरबार में थिमन्ना नाम के एक बड़े अच्छे कवी थे।  थिमन्ना विद्वानों की बड़ी इज़्ज़त करते थे। 

 

राम ने सोचा की क्यों न एक बार थिमन्ना की मदद से राज दरबार में प्रवेश करने की कोशिश करी जाए। 

इसी उम्मीद में राम थिमन्ना के घर पहुँच गया। 

थिमन्ना सच में बहुत अच्छे इंसान थे।  उन्होंने राम का सिर्फ अच्छी तरह स्वागत ही नहीं किया बल्कि राम की बुद्धिमानी भरी बातें सुन कर उसे एक कीमती रत्नों का हार भी भेंट कर दिया जो उन्हें महाराज से उपहार में मिला था। 

राम ख़ुशी ख़ुशी हार ले कर वापस आ गया। 

अगले दिन राम वही हार पहन कर दरबार पहुंचा। 

महाराज कृष्णदेव राय ने एक अनजान व्यक्ति के गले में अपना दिया हुआ उपहार देखा तो उन्हें बहुत हैरानी हुई। 

महाराज ने पूछा  – ” आप कौन हैं सज्जन ? “

राम बोला – ” में वह हूँ महाराज जिसने आप का दिल जीतने वाले का दिल जीता है। यह हार थिमन्ना ने मुझ से खुश हो कर मुझे भेंट दिया है।  “

महाराज राम की बातों से बहुत खुश हुए और बोले – ” आज से तुम हमारे तेनाली राम हुए। तुम हमारी राज पाठ चलाने में बाकी मंत्रियों की तरह सहायता करोग । विजय नगर दरबार में तुम्हारा स्वागत है   “

और इस तरह राम ने तेनालीराम बन कर विजय नगर दरबार में अपनी जगह बना ली। 

2. राजगुरु की सवारी (Rajguru's Ride)

तेनालीराम ने विजय नगर दरबार में अपनी जगह तो बना ली।  पर उसे आज भी राजगुरु द्वारा किया गया अपमान याद था।

तेनालीराम राजगुरु के बारे में छानबीन करने लगा। 

कुछ दिन छानबीन करने के बाद तेनालीराम को पता चला की राजगुरु रविवार को रोज़ सुबह जंगल जाता है और दोपहर होने से पहले वापस लौट आता है। 

राजगुरु का एक सेवक था – चिन्मय। 

चिन्मय सीधा साधा व्यक्ति था।   

एक दिन मौका पा कर तेनालीराम ने चिन्मय से बातों ही बातों में पूछा – ” चिन्मय , में देख रहा हूँ की राजगुरु रविवार रोज़ सुबह जंगल जाते हैं।  क्या तुम मुझे बता सकते हो की राजगुरु हर हफ्ते जंगल किसलिए जा रहे हैं ? “

चिन्मय चुप खड़ा रहा और तेनालीराम से नज़रें चुराने लगा। 

 

तेनालीराम ने एक बार फिर प्यार से पूछा – ” घबराओ मत चिन्मय। जो कुछ भी तुम मुझ से कहोगे वह हमारे बीच में ही रहेगा।  “

चिन्मय ने थोड़ा घबराते हुए जवाब  दिया – ” राजगुरु जंगल में शिकार करने जाते हैं।  “

यह सुनते ही तेनालीराम की आँखों में चमक आ गयी। 

विजय नगर में शिकार करना सख्त मना था।  तेनालीराम को राजगुरु को सबक सीखने का एक तरीका मिल ही गया। 

तेनालीराम अपने घर वापस आ गया। 

इस रविवार तेनालीराम भी सुबह जल्दी उठ कर राजगुरु के पीछे चल  दिया। 

राजगुरु जंगल में पहुँच कर एक ऐसी जगह रुक गया जहाँ बहुत सारे हिरण थे।

राजगुरु ने अपना तीर कमान निकला और एक हिरन पर निशाना लगाने लगा। 

” अहा , देखो तो हमारे राजगुरु शिकार करने आये हैं।  आज महाराज को पता चलेगा राजगुरु शिकार विद्या में भी कितने विद्वान् हैं।  ” पेड़ के पीछे से निकल कर तेनालीराम बोला। 

राजगुरु के हाथ से तीर कमान छूट गया। वह कांपते हुए तेनालीराम से बोला – ” तेनाली देखो मुझे माफ़ कर दो , तुम जो कहोगे में वह करने को तैयार हूँ।  “

तेनालीराम बोला – ” ठीक है।  आप मुझे अपने कन्धों पर बैठा कर विजय नगर की यात्रा कराइये और में किसी से कुछ नहीं कहूंगा।  “

बेचारा राजगुरु।  तेनालीराम को अपने कंधे पर बैठा कर विजय नगर की गलियों में घूमने लगा। 

राजगुरु के कन्धों में बुरी तरह दर्द  था पर  वह जानता था की उसके पास कोई रास्ता नहीं है। 

घूमते  घूमते,  तेनाली और राजगुरु,  राज महल के पास से निकले। 

महाराज कृष्णदेव राय अभी अभी सो कर उठे थे और अपने कमरे की खिड़की से बहार  देख रहे थे। 

तभी उनकी नज़र दूर से आते हुए एक आदमी पर पड़ी जो किसी दूसरे आदमी के कंधे पर बैठा सवारी कर रहा था। 

महाराज आग बबूला हो उठे।  उन्हें एक आदमी का किसी दूसरे को ऐसे तकलीफ देना अच्छा नहीं लगा। 

उन्होंने तुरंत अपने  सैनिकों को बुला कर सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहा – ” जाओ और जो आदमी कंधे पर बैठा हुआ है उसे नीचे गिरा कर मेरे पास मारते हुए ले कर आओ।  “

इधर से तेनालीराम ने महाराज को गुस्से में सैनकों को कुछ आदेश देते हुए देख लिया।  वह समझ गया कुछ गड़बड़ है। 

वह तुरंत राजगुरु के कन्धों से नीचे उतरा और बोला – ” चलिए राजगुरु आप थक गए होंगे।  अब में आप को विजय नगर की सवारी कराता हूँ।  “

राजगुरु की जान में जान आयी।  वह लपक कर तेनालीराम के कंधे पर बैठ गया। 

दोनों कुछ दूर ही चले होंगे की तभी सैनकों ने आ कर राजगुरु को तेनालीराम के कंधे से नीचे पटक दिया और मारते हुए महाराज के पास ले गए। 

राजगुरु की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी।  उसे समझ ही नहीं आया की हो क्या रहा है। 

सैनिकों ने राजगुरु को महाराज के सामने ला  कर  खड़ा कर दिया।  पीछे पीछे तेनालीराम भी आ पहुंचा। 

राजगुरु को इस हाल में देख कर महाराज हैरान रह गए।  वह बोले – ” राजगुरु मुझे आप से ऐसी उम्मीद बिलककुल नहीं थी।  आप बेचारे तेनालीराम के कंधे पर विजय नगर की सवारी कर रहे थे ? चलिए अभी तेनालीराम से माफ़ी मांगिये।   “

राजगुरु जानता था की यह सब तेनालीराम का किया धरा है।  पर वह कुछ बोल नहीं सकता था वरना तेनाली महाराज को सब कुछ बता कर उसे  विजय नगर से हमेशा के लिए बहार निकलवा देता। 

राजगुरु ने तेनालीराम से मांफी मांगी और अपनी चोट सहलाते हुए चुचाप वहां से खिसक गए। 

तेनालीराम मन ही मन मुस्कुरा रहा था। 

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3. अंतिम इच्छा (The Last wish)

एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने दरबार में बड़े दुखी मन से बैठे थे।

राज पुरोहित ने पूछा – ” क्या बात है महाराज ? आज आप काफी उदास लग रहे हैं। “

कृष्णदेव राय बोले – ” आज हमे हमारी स्वर्गवासी माँ की बहुत याद आ रही है। “

यह सुन कर राज पुरोहित ने समझाया – ” यह तो संसार का नियम है महाराज। जो आया है , वह एक दिन जायेगा ही। हालाँकि ख़ुशी इस बात की है की आप की माता जी ने एक अच्छा और खुशहाल जीवन पूरा किया। “

“… बस एक इच्छा अधूरी रह गयी उनकी पुरोहित जी ” महाराज बीच में पुरोहित को रोक कर बोले। 

” वह क्या इच्छा थी महाराज ? ” पुरोहित ने पूछा। 

महाराज बोले – ” हमारी माता जी को आम बहुत पसंद थे।  अपने अंतिम समय में भी वह आम खाना चाहती थीं।  पर जब तक हम आम मंगवा पाते, तब तक उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।  “

पुरोहित के मन में लालच आ गया।  उसने इस मौके का फायदा उठाने के लिए एक तरकीब सोची और बोला – ” महाराज।  यह तो काफी गंभीर समस्या है। इसका मतलब आप की माता जी को अभी शान्ति नहीं मिली होगी। “

महाराज और दुखी हो उठे और बोले – ” आप ही बताइये पुरोहित जी की हम क्या करें ?”

पुरोहित बड़ी  चालाकी से बोला – ” महाराज।  अगर आप अपने नगर के सभी ब्राह्मणों को एक भोज पर बुलाएं और फिर उन्हें एक एक सोने का आम दान करें तो आप की माता जी को शान्ति मिल सकती है। “

राजा पुरोहित की चाल में फंस गए।  उन्होंने ऐसा ही किया। 

अगले दिन।  एक बड़ा ब्राह्मण भोज हुआ और उसके बाद सभी ब्राह्मणों को एक एक सोने का आम दे कर विदा किया गया।

तेनाली राम को जब यह सब पता चला तो उसे बड़ा दुःख हुआ।  उसने राज पुरोहित को सबक सिखाने की ठानी। 

अगले दिन तेनाली राम दरबार में आ कर बोला –  ” महाराज।  जिस तरह राज पुरोहित जी ने राज माता की आत्मा को शान्ति दिलवाई।  उसी तरह मेरी माँ को भी शांति की प्रतीक्षा है। अगर आप की आज्ञा हो तो में भी सभी ब्राह्मणों को कल अपने घर भोज पर बुलाना चाहता हूँ।  “

पुरोहित बीच में बोला – ” महाराज को क्या आपत्ति हो सकती है तेनाली ?  तुम तैयारी करो।  हम कल सुबह तुम्हारे घर पर पहुँच जायेंगे। “

अगले दिन राज पुरोहित अपनी टोली के संग सुबह सुबह तेनाली राम के घर पहुँच गए।  सब ने खूब जम के दावत का मज़ा उठाया। जब भोजन समाप्त हो गया तो राज पुरोहित बोला – ” तेनाली।  क्या तुम कुछ सोने की चीज़ अपनी माँ की आत्मा की शान्ति के लिए दान नहीं करोगे ? “

तेनाली राम बोला – ” ऐसी गलती में कैसे कर सकता हूँ महाराज ? आप सब आँगन में चलिए , मेरे पास आप सभी को देने के लिए कुछ है।  “

सभी लोग आँगन  की तरफ चल दिए। 

आंगन में पहुँच कर राज पुरोहित और बाकी ब्राह्मणों के होश उड़ गए। आँगन के एक कोने में थोड़ी सी आग जल रही थी जिसमे सोने की सलाखें गरम करी जा रही थी।

राज पुरोहित ने चिल्ला कर कहा – ” यह सब क्या है तेनाली ? “

तेनाली राम बोला – ” पुरोहित जी।  मेरी माँ के घुटनो में हमेशा बहुत दर्द रहता था।  उनकी आखिरी इच्छा थी की उनके घुटनो में लोहे की गर्म सलाखें लगायी जाएं। हालाँकि उनकी यह इच्छा पूरी हो सके इस से पहले उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।  इसलिए में ने यह सोने की सलाखें गरम करवाई हैं।  जब में इन्हे आप के घुटनों में लगाऊंगा तभी मेरी माँ की आत्मा शान्ति मिलेगी। “

”  तुम पागल हो गए हो क्या तेनाली।  भला ऐसा कैसे हो  सकता है ? ” राज पुरोहित आग बबूला होते हुए बोला। 

” क्यों नहीं हो सकता पुरोहित जी।  जब आप को सोने के आम दे कर राज माता की आत्मा को शान्ति मिल सकती है तो आप के घुटनों में गर्म कर के सोने की सलाखें लगाने से मेरी माँ की आत्मा को भी तो शान्ति मिलनी चाहिए ना ? ” तेनाली बोला। 

राज पुरोहित तेनाली की बात समझ गया।  वह अपने किये पर शर्मिंदा था। 

अगले दिन सारे ब्राह्मण महाराज को सोने के आम वापस दे आये। 

जब महाराज को इस घटना के बारे में पता चला , तो वह खूब ठहाके लगा के हांसे। 

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4. एक मुट्ठीभर अनाज (A Handful of Grains)

विजय नगर में एक विद्युलता नाम की महिला रहती थी। 

विद्युलता बहुत ही बुद्धिमान महिला थी। विद्युलता को शास्त्रों की अच्छी जानकारी थी। यही नहीं वह अलग अलग किस्म की कलाएं जैसे – संगीत, नृत्य और चित्रकारी में भी निपुण थी। पर इतना होने के बाद भी विद्युलता को विजय नगर में लोग ज़्यादा पसंद नहीं करते थे।  ऐसा इसलिए था क्योंकि विद्युलता को अपनी कलाओं पर बहुत घमंड था। 

एक दिन तो हद ही हो गयी।  विद्युलता ने अपने घर के बहार एक तख्ती टांग दी जिस पर लिखा था – ” जो भी विद्वान , विद्युलता को बुद्धिमानी में हराएगा , उसे विद्युलता 1000 सोने के सिक्के देगी।  “

विजय नगर वासी यह देख कर हैरान रह गए।  हालाँकि विद्युलता का स्वभाव जानते हुए किसी ने उस से कुछ बोला नहीं। 

एक दिन एक लकड़हारा विद्युलता के घर के सामने लकड़ी बेचने आया।  लकड़हारा ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा था – ” लकड़ी ले लो।  बढ़िया जलने वाली लकड़ी ले लो। “

लकड़हारा बहुत देर से चिल्ला रहा था।  विद्युलता लकड़हारे के चिल्लाने से चिढ़चिढ़ाने लगी। 

वह  बहार आयी और गुस्से  में बोली – ” बस करो यह चिल्लाना और मुझे बताओ यह लकड़ियों का गट्ठर कितने में दोगे ? “

 लकड़हारा बोला – ” देवी।  आप मुझे इन लकड़ियों के बदले सिर्फ एक मुट्ठीभर अनाज दे दीजियेगा।  “

विद्युलता तुनक कर बोली – ” हाँ ठीक है।  जाओ अब यह लकड़ियां पीछे आँगन में रख आओ।  “

लकड़हारा आँगन में लकड़ियां रख कर आया तो विद्युलता ने उसे एक मुट्ठीभर के आनाज देना चाहा। 

पर लकड़हारा बोला – ” आप मेरी बात समझीं नहीं देवी।  में ने आप से  एक मुट्ठीभर आनाज माँगा था। “

विद्युलता अपने आप से बहार बोली – “क्या बेवकूफी है ? यह एक मुट्ठीभर अनाज ही तो है ? “

लकड़हारा बोला – ” यह बेवकूफी नहीं हैं देवी।  में ने आप से एक मुट्ठीभर अनाज देने को कहा था।  अब अगर आप मेरी यह मांग पूरी न कर सकीं।  तो आप को मुझे 1000 सोने के सिक्के देने होंगे जैसा आप ने अपने घर के बहार तख्ती पर लिखा है।  “

बात ज़्यादा बढ़ने लगी।  पूरी गली में शोर मच गया।  लोग इकट्ठे होने लगे।  आखिर में लकड़हारा और विद्युलता दोनों नगर के न्यायाधीश के पास पहुंचे। 

विद्युलता न्यायाधीश से बोली – ” इस आदमी ने मुझे सुबह से पागल कर दिया है।  इस ने मुझ से लकड़ियों के गट्ठर के बदले एक मुट्ठीभर अनाज माँगा।  अब जब में इसे  एक मुट्ठीभर आनाज दे रहीं हूँ तो यह बोल रहा है की इसे सिर्फ एक मुट्ठीभर आनाज ही चाहिए।  इसे समझना मेरी समझ से परे है।  “

न्यायाधीश ने तेनाली को अपना पक्ष रखने को कहा – ” माननीय।  में ने इनसे एक मुट्ठीभर आनाज माँगा था।  मतलब एक अनाज का दाना जिस से मेरी मुट्ठी भर जाए।  पर यह मुझे मुट्ठीभर कर आनाज के दाने दिए जा रही हैं।  यह मेरी बात समझ ही नहीं पायीं। अब इन्हे अपने कहे के मुताबिक मुझे 1000 सोने के सिक्के देना चाहिए।  “

विद्युलता समझ गयी की यह कोई लकड़हारा नहीं बल्कि लकड़हारे के भेष में कोई विद्वान हैं जो उसे सबक सिखाने के  लिए  आये हैं। 

इस से पहले न्यायाधीश कुछ कहते , विद्युलता ने लकड़हारे से अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी और साथ ही 1000 सोने के सिक्के भी दिए। 

बाद में जब सब जाने लगे तो विद्युलता ने लकड़हारे से पूछा – ” आप कौन विद्वान हैं ? “

तब लकड़हारा बोला – ” में राजा कृष्णदेव के दरबार में कवी – तेनाली राम हूँ।  “

विद्युलता का मस्तक आदर से तेनाली राम के सामने झुक गया।    

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5. तेनाली राम और मूर्ख चोर (Tenali Rama and the Foolish Thief)

तेनाली राम के घर के पीछे एक बगीचा था।  बगीचा बहुत ही सुन्दर था।  उसमे तरह तरह के फल और फूल लगे हुए थे, रंग बिरंगी तितलियाँ मंडराती और पक्षी चहचहाते थे।  तेनाली राम बगीचे को सुन्दर बनाये रखने के लिए खूब मेहनत करता।

एक समय ऐसा आया जब तेनाली राम दरबार में बहुत व्यस्त रहने लगा। तेनाली राम को समय न मिल पाने की वजह से बगीचे की देख रेख भी पहले जैसी नहीं रही।  अब बगीचे में पानी तक डालने वाला कोई नहीं था।  बगीचा दिन पर दिन सूखता जा रहा था। 

एक दिन सुबह तेनाली राम राज दरबार जाने के लिए निकल ही रहा था।  तभी तेनाली राम को अपने घर के पास झाड़ियों में कुछ लोग छिपे दिखे।  तेनाली राम को यह समझने में देर नहीं वह चोर हैं और घर में चोरी करने की फ़िराक़ में हैं। 

तेनाली राम को तुरंत अपने बगीचे को सींचने की एक तरकीब दिमाग में आयी।  तेनाली राम घर के अंदर गया और अपने बेटे से जानबूझ कर तेज़ आवाज़ में बोला – ” अरे बेटा सुनते हो ? आज कल नगर में चोरी चाकरी बहुत बढ़ गयी है।  ऐसे में गहने, जेवर और दूसरा कीमती सामान घर में रखना ठीक नहीं।  चलो एक काम करते हैं , यह सारे गहने एक बक्से में भर के अपने घर के पीछे बगीचे में जो कुआँ है उसमे छिपा दें।  “

ऐसा कह कर कुछ देर बाद , तेनाली राम अपने बेटे के साथ एक बक्सा घसीट कर बहार लाया और उस बक्से को बगीचे में ले जा कर कुएं में पटक दिया। बक्से के पानी में गिरते ही छपाक से आवाज़ हुई और झाड़ियों में छिपे चोरों की आँखों में चमक आ गयी। 

एक चोर बोला – पूरा विजय नगर तेनाली राम की अकल की दाद देता है पर यह आदमी तो बेवफ़ूक निकला। इतना भी नहीं जानता की दीवारों के भी कान होते हैं। 

ऐसा कह कर चोर हल्के से हांसे। 

तेनाली राम राज दरबार निकल गया और चोर रात होने का इंतज़ार करने लगे। 

रात हुई।  चोरों ने तेनाली के घर में प्रवेश किया।  चोरों ने सीधे बगीचे जा कर कुएं झांक कर देखा।  कुएं में पानी बहुत ज़्यादा नहीं था और बक्से का एक कोना दिखाई दे रहा था। 

चोरों ने आव देखा न ताव , बाल्टी भर भर के कुएं से पानी निकालना शुरू कर दिया। चोरों को पानी निकालने में व्यस्त देख तेनाली राम ने पूरे बगीचे में नालियां बना दीं।  अब पानी अच्छी तरह बगीचे की हर क्यारी में जा रहा था। 

कुछ देर और पानी निकालने के बाद चोरों को बक्सा साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा। 

अब उनमे से एक चोर कुएं में उतरा और अपने कंधे पर बक्सा ले बड़े उत्साह में बहार आया। 

लेकिन यह क्या – बक्सा खोलते ही चोर चरों खाने चित्त हो गए।  बक्से में गहने जवाहरात नहीं बल्कि कंकड़ पत्थर भरे हुए थे। 

चोर समझ  गए की वह  तेनाली राम से बेवकूफ बन गए हैं।  अब इस से पहले पकड़े जाएँ , यहाँ से भाग लेने में ही भलाई है। 

तेनाली राम का बगीचा इतनी अच्छी सिंचाई के बाद फिर से लहलहा उठा। 

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6. तेनाली राम का गधों को प्रणाम (Salute To Tenali Rama's Donkey)

विजय नगर का राज गुरु ताताचार्य थोड़े पुराने विचारों का व्यक्ति था। वह एक जाती विशेष के लोगों से नफरत करता था ।  जब भी कभी उस जाती के लोगों से उसका सामना होता वह अपना मुँह कपडे से ढक लेता।

लोग ताताचार्य के इस रवैये से बड़े दुखी होते। एक दिन वह सब लोग मिल कर तेनाली राम के पास आये और उसे अपना दुखड़ा सुनाया।  सब की बात सुन कर तेनाली राम को बहुत गुस्सा आया। 

तेनाली राम राजगुरु से मिलने गया और उसने राजगुरु से इस तरह के व्यवहार का कारण पूछा। 

राजगुरु बोला – ” सुनो तेनाली राम।  में तुम्हे एक राज़ की बात बताता हूँ।  इस जाती के लोग जनम से ही दुष्ट होते हैं। अगर में ने इनकी शक्ल देख ली , तो मुझे अगले जनम में गधा बनना पड़ेगा।  इसलिए में इन्हे देख के मुँह छिपा लेता हूँ हूँ।  “

 तेनाली राम राजगुरु की बात सुन के वापस  लौट आया।  वह समझ गया राजगुरु को उसकी ही भाषा में समझाना पड़ेगा।  तेनाली राम सही मौके का इंतज़ार करने लगा। 

एक दिन राजा कृषणदेव राय अपने सभी राज दरबारियों के साथ विजय नगर घूमने निकले।  इस जुलूस में तेनाली राम और राजगुरु भी शामिल थे। 

रास्ते में एक गधों का झुण्ड मिला। उन्हें देखते ही तेनाली राम को एक तरकीब सूझी। 

वह जुलूस से निकल के गधों के सामने गया और सर झुका के उन्हें प्रणाम करने लगा। 

राजा कृष्णदेव राय हँसते हुए बोले – ” यह क्या कर रहे हो तेनाली राम ? “

तेनालीराम ने कहा – ” में राजगुरु के पूर्वजों को प्रणाम कर रहा हूँ महाराज।  “

राजगुरु आगबबूला हो कर बोला – ” यह क्या बदतमीज़ी है तेनाली ? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पूर्वजों के बारे में ऐसा मज़ाक करने की ?”

तेनाली राम ने शांति से जवाब दिया – ” हे ताताचार्य।  आप ने मुझे बताया था ना की अगर आप लोग एक जाती विशेष के लोगों को देख लें , तो अगले जनम में गधा बनना पड़ता है ? संभव है की यह गधे आप ही के पूर्वज हो जिन्होंने ने गलती से उस जाती के लोगों का मुँह देख लिया था और जिस वजह से इस जनम में इन्हे गधा बनना  पड़ा है।  “

राजगुरु तेनाली राम की बात समझ गया और अपने किये पर शर्मिंदा हो गया। 

राजा कृषणदेव राय तेनालीराम की समझदारी पर मुस्कुराये और जुलूस आगे बढ़ गया। 

राजगुरु ने फिर कभी किसी के  व्यवहार नहीं किया। 

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7. कूबड़ का इलाज (The Treatment)

दिल्ली सुलतान हमेशा इस फ़िराक़ में रहते की किस तरह विजय नगर राज्य को अंदर से कमज़ोर कर के उसे अपनी सल्तनत में मिला लिया जाये।  इन दिनों दिल्ली सुलतान ने अपना एक जासूस विजय नगर पर नज़र रखने के लिए भेजा था। जासूस साधु का भेष बना कर घूमता और विजय नगर दरबार के बड़े बड़े मंत्रियों को अपने झांसे में ले कर उनसे खूफिया जानकारी निकलवा लेता।  अगर कभी किसी को साधु के भेष में जासूसका का पता चल जाता तो वह उसे धतूरा खिला कर पागल कर देता। 

तेनाली राम को जब इस बारे में पता चला तो  उसने जासूस को सबक  सिखाने की ठानी।

तेनाली राम जासूस से मिलने गया और उसे बहला फुसला कर अपने साथ किसी काम के बहाने एक ऐसे आदमी के पास ले गया जो कुछ दिन पहले इसी जासूस का धतूरा खा कर पागल हुआ था। 

पागल आदमी के पास आते ही तेनाली राम ने जासूस का हाथ पकड़ कर उस आदमी के सर पर दे मारा।  अब उस आदमी ने आव देखा न ताव और साधु के भेष में जासूस का सर फोड़ डाला। 

यह बात राजा कृषणदेव राय तक पहुंची।  कृषणदेव राय को अभी जासूस की पूरी कहानी पता नहीं थी।  वह यही समझ बैठे की तेनाली राम ने एक साधू के साथ यह दुर्व्यवहार किया। 

गुस्से में आगबबूला हो कर कृष्णदेव राय ने तेनाली राम को मृत्युदंड दे दिया। 

सैनिक तेनाली राम को एक खाली मैदान में ले गए और वहां ले जा कर उन्होंने तेनाली राम को गरदन  तक ज़मीन में गाड़ दिया।  सैनिकों ने सोचा कुछ समय तक यह भूखा प्यासा रहेगा  तो अपने आप ही प्राण त्याग देगा। 

पर सैनिक भूल गए की उनका पाला तेनाली राम से पड़ा था। 

सैनिकों के जाने के कुछ देर बाद तेनाली राम को एक धोबी अपनी तरफ आता दिखाई दिया। धोबी की कमर झुकी हुई थी जिस से यह साफ़ समझा जा सकता था की धोबी को कूबड़ को समस्या थी। तेनाली राम ने तुरंत खुद को ज़मीन से निकालने की एक  तरकीब  सोची। तेनाली राम आँख बंद कर के धोबी के और पास आने का  इंतज़ार करने लगा। 

धोबी ने जब पास आ कर तेनाली राम को देखा तो पूछा – ” यह तुम ज़मीन में क्या कर रहे हो ? “

तेनाली बोला – ” मुझे बहुत समय से कूबड़ की समस्या थी।  फिर मुझे एक वैद्य मिले जिन्होंने मुझे अपनी कूबड़ सीधा करने के लिए कुछ घंटे खुद को ज़मीन में गर्दन तक गड़ा रहने का सुझाव दिया।  पिछले 4 घंटे से ऐसे ही ज़मीन में गड़ा  हूँ।  अब ज़रा मुझे बहार निकाल कर देखो क्या मेरी कमर सीधी हुई ? “

धोबी ने उत्साह में तेनाली राम को ज़मीन से बहार निकाला और देखा की तेनाली की कमर बिलकुल सीधी थी।

अब धोबी बोला – ” मेरी मदद कीजिये।  में भी लम्बे समय से अपनी कमर के कूबड़ से परेशान हूँ।  आप मुझे ज़मीन में गर्दन तक गाड़ दीजिये , कुछ समय बाद मेरी पत्नी यहाँ आएगी और मुझे  यहाँ से निकल लेगी।   तब तक मेरी कमर भी सीधी हो चुकी होगी। “

तेनाली धोबी को ज़मीन में गर्दन तक गाड़ कर वहां से निकल गया। 

 उधर कृषणदेव राय को उस जासूस की असलियत का पता चल चुका था।   अब वह अपने किये पर पछता रहे थे। 

तभी दरबार में आवज़ गुंजी – ” महाराज की जय हो।  “

सब ने पीछे मुड के देखा तो यह तेनाली राम की आवाज़ थी। 

महाराज ने अपनी गद्दी से उठ कर तेनाली राम को गले से लगा लिया।

8. मनहूस कौन ? (Who is wretched?)

विजय नगर में मूर्थी नाम का एक आदमी रहता था। 

मूर्थी के बारे में यह धारणा थी की जो सुबह उठ के सब से पहले मूर्थी का मुँह देख लेता उसे पूरे दिन खाना नसीब नहीं होता। 

यह खबर उड़ते उड़ते राजा कृष्णदेव राय के पास पहुंची।  राजा कृष्णदेव राय ऐसे आदमी के बारे में सुन कर बड़े हैरान हुए। आखिर में उन्होंने मूर्थी को अपने राज महल आने का न्योता दिया।  राजा ने सोचा एक बार खुद परख कर देखेंगे की मूर्थी के मनहूस होने की खबर सच है या अफवाह। 

मूर्थी को राज महल के ठाठ बाठ देख कर बहुत मज़ा आ रहा था। खाने के लिए उसे स्वादिष्ट पकवान और सोने के लिए उसे  मखमली बिस्तर मिला।  मूर्थी की रात बहुत अच्छी बीती।

अगले दिन , सूरज की पहली किरण निकलते ही राजा कृष्णदेव राय उठ कर अपनी नज़रें बचाते हुए सीधे मूर्थी के कमरे में गए और सब से पहले मूर्थी का चेहरा देखा।  उसके बाद राजा नहा धोकर नाश्ता करने बैठे।  राजा बैठे ही थे की राज सेवक भागा भागा कक्ष में आया और बोला – ” महाराज गज़ब हो गया।  कुछ जंगली हाथियों के झुण्ड ने विजय नगर में रहने वाले किसानो के खेतों पर धावा बोल दिया है।  अगर उन्हें जल्दी नहीं भगाया गया तो  वह सारी फसल तहस नहस कर देंगे।  “

यही सुनते ही कृष्णदेव राय नाश्ता किये बिना तुरंत अपनी सेना को लेकर खेतों की तरफ निकल गए।

हाथियों का झुण्ड खदेड़ कर महाराज को महल वापस आने में शाम हो गयी। 

महल वापस आने के बाद महाराज खाना खाने बैठे।  पर यह क्या – रसोइये ने गलती से दाल सब्ज़ी में नमक की जगह चीनी दाल दी थी।  महाराज बिना खाना खाये भोजन कक्ष से उठ कर चले गए। 

अब महाराज को मूर्थी के मनहूस होने पर यकीं सा आ चला था। वह गुस्से से आग बबूला हो उठे। उन्होंने अगले दिन मूर्थी को मृत्युदंड देने के सज़ा सुना डाली। 

मूर्थी के घर में अफरा तफरी मच गयी। मूर्थी घर में कमाने वाला अकेला सदस्य था।  जब कोई रास्ता ना दिखा तो मूर्थी की पत्नी अपने एक साल के छोटे बच्चे को ले कर तेनाली राम के पास मदद की गुहार ले कर गयी। 

तेनाली राम ने मूर्थी की मदद करने का भरोसा दिलाया और मूर्थी की बीवी को कुछ समझा कर घर भेज दिया। 

अगले दिन मूर्थी को मृत्युदंड देने के लिए नगर के बीचों बीच ले जाया जा रहा था। 

तभी मूर्थी की पत्नी बीच चौराहे पर आयी और  तेज़ आवाज़ में रोते रोते कहने लगी ” देख लें विजय नगर वासी।  मेरे पति की शक्ल जो सुबह सब से पहले देख ले उसका दिन भर का भोजन छीन जाता है।  पर राजा कृषणदेव राय की  शक्ल जो सुबह सब से पहले देख ले उस के तो प्राण ही छीन जाते हैं। अब आप तय करें कौन ज़्यादा मनहूस है ? “

राजा कृष्णदेव राय को यह शब्द तीर की तरह चुभ गए।  उन्होंने तुरंत मूर्थी  रुकवा दी और उसे सम्मानपूर्वक महल से विदा करने का हुक्म दिया। 

जाने से पहले महाराज ने मूर्थी की पत्नी से पूछा – ” यह सुझाव तुम्हे किसने दिया ? “

तब मूर्थी की पत्नी बोली – ” तेनाली राम ने। “

महाराज कृष्णदेव राय तेनाली राम को बुला कर आँखों में आंसू भर कर बोले – ” आज तुम ने मुझे एक महा-पाप करने से बचा  लिया तेनाली। तुम सच में अद्भुत हो। “

9. मेरी मातृभाषा क्या है ? (What is my Mother Tongue?)

एक दिन विजय नगर में कहीं दूर देश से एक भुवन नाम का विद्वान् आया।  भुवन महाराज कृष्णदेव राय के लिए अपने साथ बहुत सारे उपहार ले कर आया था।  महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने भुवन को कुछ दिन अपने राज महल में रुकने का निमंत्रण दिया। भुवन ने ख़ुशी ख़ुशी महाराज का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। 

शाम को महाराज अपने नए मेहमान भुवन के साथ बगीचे में टहल रहे थे।  महाराज बोले – ” माननीय।  आप ने बताया नहीं की आप किस देश में रहते हैं ? “

भुवन को सीधा जवाब देने के बदले मसखरी करने की सूझी।  वह बोला – ” महाराज में ने सुना है आप के दरबार में एक से एक बुद्धिमान मंत्री उपस्थित हैं।  में आप से निवेदन करता हूँ की आप एक बार उन सभी से मेरी  मातृभाषा पता करने की कोशिश करने को कहिये। अगर वह मेरी मातृभाषा जान गए तो में किस देश का रहने वाला हूँ यह भी ज़रूर जान जायेंगे।  “

महाराज को भुवन की बात भा गयी।  उन्होंने अपने सभी बड़े मंत्रियों को बुलाया और भुवन से बात कर के उसकी मातृभाषा जान ने की कोशिश करने को कहा। 

एक एक कर के कृष्णदेव राय के सभी मंत्री आये। 

किसी ने बंगाली में , तो किसी ने मराठी में , किसी ने तेलगू में , तो किसी ने मलयाली में , हर भाषा में भुवन से बात कर के उसकी मातृभषा पता लगाने की कोशिश करी। पर भुवन की अलग अलग भाषाओँ पर पकड़ इतनी मजबूत थी की कोई भी मंत्री भुवन की मातृभाषा का पता नहीं लगा सका। 

जब सब मंत्रियों ने अपने हथियार डाल दिए तो महाराज को चिंता हुई।  क्या मेरे दरबार में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो इन सज्जन की मातृभाषा का पता लगा सके ?

तभी महाराज को तेनाली राम का ख्याल आया।  उन्होंने तुरंत तेनाली राम को बुलवाया और उस से इस समस्या का हल निकालने के लिए कहा। 

तेनाली बोला – ” महाराज आप चिंता न करें।  कल सुबह दरबार में सब के सामने में , मैं इन सज्जन की मातृभषा बता दूंगा। अब रात हो गयी है आप सब घर जाइये और आराम करिये।  “

भुवन अपनी चतुराई पर बहुत खुश हुआ और महल में अपने कक्ष में जा कर आराम करने लगा। 

कुछ देर में भुवन को रात के खाने के लिए एक राज सेवक बुलाने आया।  भुवन भोजन कक्ष में पहुँच गया और उसके सामने भोजन की थाली लगा दी गयी। 

जैसे ही भुवन ने भोजन का पहला निवाला मुँह में लिया, वैसे ही उसकी चीख निकल गयी। भोजन में मिर्च बहुत अधिक थी।  तीखे से भुवन का मुँह जला जा रहा था। 

सेवक जल्दी से भुवन के पीने के लिए ठंडा पानी और खाने के लिए कुछ मीठा ले कर आये जिस से भुवन को थोड़ा आराम मिला। 

राज सेवकों ने खाने में ज़्यादा मिर्च होने के लिए माफ़ी मांगी और भुवन के लिए नयी थाली लगवा दी।  इस बार भोजन में नमक मिर्च सब बराबर थी।  भुवन ने खूब  शौक से खाना खाया और फिर अपने कक्ष में जा कर चैन की नींद सो गया। 

अगले दिन सब लोग दरबार में इकट्ठे हुए।  बस तेनाली राम का ही आता पता नहीं था। 

महाराज ने पूछा – ” आज तेनाली कहाँ रह गया ?”

भुवन ने चुटकी लेते हुए कहा – ” लगता है श्रीमान मेरी मातृभाषा पता न कर पाने के कारण अपना मुँह नहीं दिखाना चाहते।  “

तभी तेनाली राम दरबार में प्रवेश करता है और कहता है – ” महाराज की जय हो।  तेनाली राम आप की सेवा में उपस्थित है।  “

महाराज ने उत्सुकता से पूछा – ” क्या तुम्हे भुवन की मातृभाषा पता चली तेनाली ? “

“अवश्य महाराज ” तेनाली बोला ” भुवन जी की मातृभाषा तमिल है और यह तमिल के ही किसी नगर के वासी हैं।  “

सब लोग हैरान थे। महाराज ने भुवन से पूछा – ” क्या तेनाली राम सही कह रहा है ? “

भुवन ने सर झुका के हाँ में उत्तर दिया। 

महाराज तेनाली राम से बहुत प्रसन्न हुए और बोले बोले – ” जब कोई विद्वान् की मातृभाषा पता न लगा सका तो तुम ने कैसे  तेनाली ? “

तेनाली बोला – ” गुस्ताखी माफ़ हो महाराज। कल में ने चुपके से खाना बनाने वाले रसोइये से आग्रह कर के भुवन की पहली थाली वाले भोजन में जानबूझ के ज़्यादा मिर्च डलवा दी थी और उसे छिपकर भोजन कक्ष पर नज़र रखने को कहा।  भुवन इतना तीखा खाना खा कर छटपटा उठे और जब भी कोई व्यक्ति तकलीफ में होता है तो वह सब कुछ भूल कर अपनी मातृभाषा में अपनी माँ को ही पुकारता है।  भुवन भी इतना तीखा खाना खा कर  – अम्मा अम्मा अम्मा …. चिल्लाने लगे जो की तमिल भाषा में माँ को बोला जाता है।  और इस तरह मुझे भुवन की मातृभाषा और देश का पता चल गया।  “

पूरा दरबार तेनाली राम की सूझबूझ की सराहना करने लगा। 

भुवन भी बोला – ” तेनाली राम के बारे में जो सुना था सच ही सुना था।  “

10. तेनालीराम और अरबी घोड़े (Tenali Rama & The Arabian Horse)

एक बार विजय नगर में एक अरबी घोड़ों का व्यापारी आया। 

व्यापारी ने अपने घोड़े राजा कृष्णदेव राय को दिखाए। 

अरबी घोड़ों की शान ही निराली थी। लम्बी गर्दन , गठीला शरीर , बिजली सी फुर्ती। महाराज व्यापारी के घोड़ों के कायल हो गए। वह सोचने लगे अगर इतने मज़बूत घोड़े हमारी सेना में शामिल हो जाएँ तो दुश्मन देश हमला करने से पहले 10 बार सोचेंगे। 

महाराज ने ज़्यादा सोच विचार किये बिना व्यापारी के सारे घोड़े खरीद लिए। 

अब प्रश्न उठा घोड़े पालने का।  विजय नगर में इतना बड़ा अस्तबल नहीं था जहाँ इतने सारे घोड़ों का रख रखाव हो सके। 

अगले दिन महाराज ने दरबार में घोषणा कर दी की सारे राज दरबारी एक एक घोडा पालने की ज़िम्मेदारी लेंगे।  घोड़ों को पालने के लिए हर महीने राज दरबारियों को 1 सोने का सिक्का दिया जायेगा। 

यह सुन कर सभी दरबारियों का माथा ठनका।  1 सोने के सिक्के में इतने बड़े घोड़े का पालन पोषण कैसे संभव है ? पर किसी की इतनी मजाल जो महाराज के निर्णय के आगे कुछ बोल सके। 

सभी दरबारी एक एक घोडा ले कर अपने साथ चले गए। सभी ने अपने अपने घरों में एक बढ़िया सा अस्तबल बनवा लिया। महाराज नाराज़ ना हो जाएँ इसलिए दरबारी खुद भूखे रहते लेकिन घोड़ों का पेट भरते।

सब की तरह तेनालीराम को भी एक घोडा मिला था। पर तेनालीराम घोड़े को ले कर बिलकुल परेशान नहीं था।  उसने , अपने घर के पीछे आँगन में एक छोटी सी झोपड़ी बना कर उसमे घोड़े को रख दिया। जब चारा देने की बारी आती तो  तेनाली राम झोपड़ी के एक छोटे से झरोखे से घोड़े को ज़रा सा चारा दे देता। पर घोड़े के रख रखाव के लिए मिले 1 सोने के सिक्के से ज़्यदा  1 पैसा तेनाली अपनी जेब से नहीं खर्च करता। 

3 महीने बीते।  महाराज कृष्णदेव राय ने सभी घोड़ों की सेहत जांचने की सोची और अगले दिन सभी दरबारियों को अपने अपने घोड़े साथ लाने को कहा।

अगले दिन दरबारी अपने घोड़े ले कर दरबार आये।  सब के घोड़े एकदम तंदरुस्त थे। पर तेनालीराम का घोडा कहीं नज़र नहीं आ रहा था।  महाराज ने पूछा – ” तेनाली तुम्हारा घोडा कहाँ है ? “

तेनालीराम बोला – ” महाराज घोडा बहुत खूंखार हो गया है जिस वजह से में उसे यहाँ ला नहीं सकता।  “

तभी राजगुरु ताताचार्य उछाल के बोला – ” महाराज  तेनालीराम कुछ छिपा रहा है।  घोडा कोई जंगली जानवर नहीं जो खूंखार हो जायेगा।  “

तेनालीराम बोला – ” महाराज आप खुद ही सब के साथ कर क्यों नहीं देख लेते ? “

सभी दरबारियों को महाराज के साथ तेनालीराम के घर पहुँच कर पता चलता है की तेनाली ने घर के आँगन में एक छोटी सी झोपड़ी के अंदर घोड़े को रखा हुआ है। तभी राजगुरु  ने उचक के जिस झरोखे में से तेनाली घोड़े को चारा देता था  वहां से झाँक कर घोड़े को देखना चाहा। घोड़े ने राजगुरु की दाढ़ी , चारा समझ कर चबाना शुरू कर दी।  राजगुरु दर्द के मारे चिलाने लगा। तब एक सैनिक ने राजगुरु की दाढ़ी काट कर उसे छुटकारा दिलाया। 

घोड़े को  झोपड़ी से बहार लाया गया।  देखा तो घोडा बिलकुल दुबला पतला हो गया था। 

महाराज क्रोध में बोले – ” तेनाली , तुम घोड़े को भूखा प्यासा रखोगे तो वह खूंखार नहीं होगा तो क्या होगा ? “

तेनाली बोला – ” क्षमा करियेगा महाराज।  अगर यह घोडा भूखा प्यासा रह कर इतना खूंखार हो गया है , तो उन दरबारियों का हाल सोचिये जो इन घोड़ों को पालने के लिए 3 महीने से भूखे प्यासे रह रहे हैं ? “

महाराज तेनाली राम का इशारा समझ गए और अपने किये पर शर्मिंदा हुए। 

उन्होंने सारे दरबारियों से घोड़े वापस माँगा लिए और घोड़ों के पालने के लिए  महल के पास ही अस्तबल बनवाने का काम शुरू करा दिया। 

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