Vikram Betal | Vikram Aur Betal Ki Kahani

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Vikram betal

Vetala Panchavimshati (Sanskrit: वेतालपञ्चविंशति or Baital Pachisi (“Twenty-five (tales) of Baital”), is an ancient Indian story collection of a King and a Ghost. Internationally, these are popularly known as Vikram Betal Stories and were originally written in Sanskrit. This is a collection of very well known stories in India, and have also been translated into various languages including Hindi, Tamil, Bengali, English, and Marathi. Every narrative contains a moral lesson for the listeners.

According to folklore, the King of Ujjain, Vikramaditya or Vikram, is said to have promised to bring a ghost named Betal to a sage to help him complete his prayers. Following Vikram’s encounter with Betal, the ghost agrees to accompany him on one condition. During the journey, Betal will tell King Vikram a story and will ask him a question at the end. If Vikram gave the right answer, then Betal will fly back to his tree. If Vikram knowingly decided to stay quiet, then he will end up losing his life, and only if Vikram really doesn’t know the answer to Betal’s question, he can take Betal to the sage. And thus began the journey of Vikram and Betal.

Vikram Betal Hindi Stories is a collection of interesting stories that conclude with a question. Dig through this piece of history and listen to all the stories with kids and rest of the family.

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विक्रम और बेताल – परिचय| Vikram Betal Stories - Introduction

एक समय की बात है।  धारानगर नाम के राज्य में राजा विक्रमादित्य का शासन था जो की राजा  विक्रम के नाम से जाने जाते थे और अपने सुशासन के लिए दूर दूर तक प्रसिद्ध थे। एक दिन राजा विक्रम के दरबार में एक साधु आया और उनको एक फल दिया जिसमे बहुमूल्य रतन था। साधु ने राजा विक्रम से अपनी तपस्या पूरी करने के लिए उनकी मदद मांगी और अगली रात नगर से दूर स्थित एक सुनसान मैदान में आने को कहा। 

जब राजा विक्रम, साधु के बताये स्थान पर पहुंचे तो साधु ने उनसे 2 कोस दूर के एक पेड़ से बेताल नाम के भूत को लाने को कहा।

पेड़ तक पहुंचने पर राजा को बेताल तो मिला, पर साधु के पास जाने के लिए बेताल ने

एक शर्त रखी की वह रास्ते में एक कहानी सुनाएगा और अंत में एक प्रश्न पूछेगा।  अगर राजा विक्रम ने सही जवाब दिया तो बेताल वापिस अपने पेड़ पर उड़ के चला जायेगा, यदि उत्तर आने पर भी वह चुप रहे तो उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा। पर अगर राजा विक्रम सच में प्रश्न का उत्तर नहीं जानते होंगे तो ही वह बेताल को साधु के पास ले जा सकते हैं।

राजा विक्रम बेताल की बात मान गए और इसी के साथ शुरू होता है विक्रम बेताल का अनोखा सफर।  

विक्रम बेताल को पेड़ से उतार कर जब भी साधु के पास ले जाने को निकलते, तो बेताल एक नई कहानी शुरू कर देता था।  आइये सुनते हैं उनकी एक नई कहानी।

Table of Contents

Collection of Popular Vikram Betal Stories In Hindi

Vikram Betal Story 1: पाप किसका था ?

बहुत पुराने समय की बात है।  बनारस में एक राजा अपनी रानी के साथ रहता था। राजा का एक राजकुमार था जिसका नाम वज्रमुकुट था।  वज्रमुकुट की नगर के मंत्री  के लड़के के साथ अच्छी दोस्ती थी। एक दिन वह दोनों जंगल की सैर पर निकले।  

काफी दूर पहुंचने के बाद उन्हें एक तालाब दिखाई दिया जो बहुत सुन्दर था।  तालाब के आस-पास काफी हरियाली थी  और बहुत सी  चिड़िया चहक रहीं थीं।  राजकुमार और उसका दोस्त वही कुछ देर आराम करने लगे। 

जब उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा की एक राजकुमारी अपनी कुछ सहेलियों के साथ तालाब में स्नान करने आयी है। राजकुमार वज्रमुकुट को उस राजकुमारी को देखते ही उससे प्यार हो गया।  जब राजकुमारी की नज़र वज्रमुकुट पर पड़ी तो वह भी उससे बहुत प्रभवित हुई ।

फिर राजकुमारी ने एक फूल लिया। पहले तो उसने फूल अपने कान में लगाया, फिर उसी फूल को अपने दांतों से काट के अपने  पैरों में गिरा दिया और आखरी में उसे उठा के अपने सीने से लगा लिया।  इसके बाद राजकुमारी और उसकी  सहेलियां तालाब से चली गयीं।  

राजकुमार रास्ते भर राजकुमारी के बारे में सोचता रहा।  जब उसके दोस्त ने उसे इस हाल में देखा तो कारन पूछा। 

इस पर राजकुमार ने कहा “मित्र, में उस राजकुमारी से शादी करना चाहता हूँ।  “

राजकुमार के मन की बात जान कर, उसके दोस्त ने  पूछा “क्या जाने से पहले राजकुमारी ने तुम्हे अपने बारे में कुछ बताया था?”

राजकुमार ने जवाब दिया “नहीं, पर उसने एक फूल लेकर अपने कान में लगाया, फिर उसी फूल को  दांत से काटाउसके बाद उस फूल को अपने पैरों में गिराया , और फिर उसे उठा के अपने सीने से लगा कर वह चली गयी”.

राजकुमार का दोस्त सब समझ गया।  उसने कहा ” मित्र, वह तुम्हें इशारों में सारी बातें समझा गयी।  उसने फूल को लेकर कान में लगाया मतलब वह कर्णाटक की राजुकमारी हैं, फिर उसी फूल को  दांत से काटा, मतलब की वह दंतवात महाराज की बेटी है। जब उसने फूल अपने पैरों में गिराया, इसका मतलब था वह अपना नाम पद्मावती (Padmavati) बता रही थी, और जब उसने उसी फूल को अपने सीने से लगाया , तब वह यह कहना चाहती थी की वह भी तुम्हें पसंद करती है। “

राजकुमार की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।  वह तुरंत ही अपने दोस्त के साथ कर्णाटक की तरफ निकल गया। 

दोनों दोस्त सीधा राजमहल पहुँच गए। राजमहल के पास उन्हें एक बूढी काकी दिखाई दी।  जब राजकुमार ने उससे राजकुमारी के बारे में पूछा और अपने बारे में बताया तो काकी बहुत खुश हुई।  बूढी काकी राजमहल की सेविका रह चुकी थी और राजकुमारी का बचपन उनकी आँखों के सामने ही बीता था ।  काकी राजकुमार की मदद करने को राज़ी हो गयी और उन्होंने दोनों को अपनी झोपडी में रहने को कहा ।

काकी ने अगले दिन,राजकुमारी को सन्देश पहुंचा दिया की राजकुमार उसे लेने इस देश में आ गया है और आज रात को उससे मिलने महल के बगीचे में आने वाला है। यह सुन कर राजकुमारी बहुत खुश हुइ और रात होने का इन्तजार करने लगी। 

जब रात हुई तो राजकुमार और राजकुमारी एक दूसरे से मिले।  राजकुमार ने महाराज के सामने दोनों की शादी की बात करने की इच्छा जताई।  इस पर राजकुमारी ने बताया की महाराज कभी भी उन दोनों का रिश्ता नहीं स्वीकारेंगे।  राजकुमार वज्रमुकुट यह सुन कर बहुत मायूस हुआ और राजकुमारी से विदा लेकर महल से बहार आ गया। बहार उसने अपने दोस्त को सारी बात कह सुनाई।

राजकुमार और उसका दोस्त किसी तरह राजकुमारी को महल से निकाल लाने के लिए योजना बनाने लगे।  आखिर में राजकुमार के दोस्त ने एक तरकीब सोच ही ली।  सबसे पहले, राजकुमार और उसके दोस्त ने काकी से कह के राजकुमारी से उसके जेवर मंगवा लिए।  फिर  राजकुमार और उसका दोस्त साधू और चेले का भेष बना के उन गहनों को बेचने, नगर के एक सुनार के पास गए।  सुनार देखते ही समझ गया की यह राजकुमारी के गहने हैं।  वह तुरंत राजा को यह बात बताने राजदरबार गया। राजा को यह बात पता चली तो उसने साधु और उसके चेले को बुलाया। 

सच सच बताओ , यह गहने तुम्हे कहा से मिले?राजा ने कड़क आवाज़ में पूछा। 

महाराज, हम नहीं जानते। हम तो तपस्या कर रहे थे, तभी एक डकैत हमारी झोपडी के पास लूट के इरादे से आयी।  हमने किसी तरह उसे डरा के भगाया और यह गहने छीन लिए महाराज” साधु के भेष में राजकुमार के दोस्त ने कहा। 

राजा यह सुन के सोच में पड़ गया की उसकी बेटी ने ऐसा काम कैसे किया होगा। 

फिर उन्होंने साधु से पूछा ” आपके विचार से जब कोई राजमहल का व्यक्ति ऐसा काम करे तो उसे क्या सजा मिलनी चाहिए?

उसे नगर से निकल देना चाहिए महाराज” साधु के भेष में राजकुमार के दोस्त ने जवाब दिया।

राजा ने राजकुमारी को डोली में बिठा के नगर के बहार भिजवा दिया।  राजकुमार और उसका दोस्त पहले ही राजकुमारी के इंतज़ार में थे। उन्होंने राजकुमारी को वहां से अपने साथ लिया और अपने देश बनारस को वापस लौट गए। 

कहानी ख़तम करते ही बेताल ने राजा विक्रम से पूछा “बताइये विक्रम , इस कहानी में पापी कौन है?”  

इस पर विक्रम ने सोचा और फिर जवाब दिया “राजकुमार वज्रमुकुट और राजकुमारी पद्मावती ने अपनी इच्छा से एक दूसरे को पसंद  किया इसलिए वह पापी नहीं हैं। उसी तरह राजकुमार के दोस्त ने अपने दोस्त की मदद की और वह भी पापी नहीं है।  पाप राजा से हुआ जो उसने बिना अपनी बुद्धि का प्रयोग करे, पराये लोगो की बात पर भरोसा कर के राजकुमारी को घर से निकल दिया।”

आप का जवाब सही है विक्रम ” और यह कह कर बेताल वापस अपने पेड़ की तरफ उड़ चला। 

कहानी से सीख: हमेशा बुद्धि का इस्तेमाल करके ही फैसला लेना चाहिए।

Vikram Betal Story 2: पति कौन हुआ ?

बहुत समय पहले , यमुना नदी के तट पर एक धर्मस्थल नाम का नगर बसा था।  उस नगर में केशव नाम का एक आदमी रहता था जो सरलता से  अपना जीवन बिता रहा था।  केशव की एक बेटी थी जिसका नाम  मधुमती था। जब उम्र हुई तो केशव और उसके घरवालों को मधुमती  की शादी  की चिंता हुई।

एक बार केशव को अपने किसी रिश्तेदार की शादी में जाना था ।  मधुमती के भाई को भी पढ़ाई के लिए बहार जाना पड़ा। उसी रोज़ धर्मस्थल में एक नया  युवक आया और संयोग से उस युवक का रुकना केशव के घर हुआ।  युवक के व्यवहार से मधुमती की माँ ने खुश हो कर अपनी बेटी की शादी उससे पक्का करने की ठान ली। 

समस्या तब आयी जब केशव और मधुमती का भाई दोनों मधुमती की शादी के लिए एक एक लड़का अपने साथ लेकर लौटे।

इससे पहले की यह फैसला हो पता की मधुमती की शादी किस से हो, मधुमती को एक सांप ने डस लिया जिस से उसकी मृत्यु हो गयी। 

इस घटना के बाद , शादी करने को इच्छुक पहला लड़का  मधुमती के कपडे और उसका अन्य सामन लेकर अपने घर चला गया।  वह रोज़ मधुमती की निशानी ऐसे संभल के रखता था जैसे मधुमती अभी जिन्दा हो। 

जिस जगह मधुमती ने प्राण छोड़े थे, शादी के लिए तैयार दूसरे लड़के ने उसी जगह घर बना लिया और ऐसे रहने लगा जैसे मधुमती के साथ ही जीवन बिता रहा हो। 

और तीसरा लड़का साधु बन के नगर और गाँव में घूमने लगा।  घूमते घूमते एक बार साधु  एक नगर में पहुंचा जहा एक वयक्ति ने उसे रात के खाने पर निमंत्रित किया। 

साधु रात में खाना खाने सज्जन के घर पंहुचा।  दुर्भाग्य से खाने पर निमंत्रण देने वाले व्यक्ति के बालक को सांप ने डस  लिया जिससे बालक की मृत्यु हो गयी।  किन्तु वह सज्जन एक संजीवनी विद्या जानते थे जिसका इस्तेमाल कर उन्होंने अपने बालक में फिर से प्राण फूंक दिए।  साधु यह देख कर काफी खुश हुआ। सज्जन ने साधु को भी इस विद्या का इस्तेमाल करना सिखाया जिसे सीखकर साधु ख़ुशी-ख़ुशी मधुमती को जीवित करने वापस लौट आया। 

वापस आ कर, साधु ने बाकी दोनों लड़को को भी बुलाया और उनके सामने संजीवनी विद्या का इस्तेमाल करके मधुमती को फिर से जीवित कर दिया ।  

मधुमती  के ज़िंदा होते ही, फिर यह प्रश्न उठा की मधुमती के विवाह के लिए तीनो में से सब से योग्य युवक कौन ?

कहानी यहीं ख़तम करके बेताल ने पूछा ” आपको क्या लगता है विक्रम, की मधुमती की शादी किस से होनी चाहिए ? “

विक्रम ने उत्तर दिया ” जिस लड़के ने मधुमती के कपडे और अन्य सामन ले जाकर उसकी सेवा करी, वह हुआ उसका बेटा। जिस लड़के ने उसमे जान डाली, वह हुआ उसका पिता। और जिस लड़के ने उसकी मृत्यु के स्थान पर घर बना के जीवन बिताया, सही मायने में वह हुआ उसका जीवन साथी।”

सही जवाब सुन के बेताल फिर से विक्रम के पास से उड़के अपने पेड़ पर पहुंच गया।  

कहानी से सीख: चतुराई और बुद्धि से  सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है

Vikram Betal Story 3: किसका त्याग बड़ा ?

एक समय की बात है, बर्दवान नाम के नगर  में रूपसेन नाम का राजा रहता था। 

एक दिन दोपहर में राजा अपने कमरे में आराम कर रहा था। तभी उसे दरबार में कुछ शोर सुनाई दिया। राजा ने अपने सेवक को बुलाया और उस से इस शोर की वजह पूछी। 

सेवक ने बताया “राजन, एक बीरबर नाम का आदमी आपसे नौकरी मांगने आया है। “

यह सुन कर राजा खुद उस आदमी से बात करने दरबार की तरफ चल पड़ा । 

राजा ने पूछा “कहो बीरबर, तुम किस काम में माहिर हो ? “

बीरबर ने बताया “राजन, में आपका रक्षक बन के दिन रात आप की रखवाली करना चाहता हूँ। “

राजा ने बोला  ” मंज़ूर है , तनख्वाह कितनी लोगे ? “

बीरबर ने कहा ” हर महीने मैं आपसे एक हज़ार सोने के सिक्के लूंगा।  “

दरबार में सभी लोग यह सुन के हैरान रह गए की एक रखवाला इतने पैसे मांग रहा है। 

राजा ने फिर पूछा “तुम्हारे घर में कितने लोग हैं? “

बीरबर ने बताया “हम चार लोग हैं राजन , मेरी पत्नी, एक लड़का , एक लड़की और मैं”

राजा ने बीरबर की बात मान ली और उसे नौकरी पर रख लिया। 

बीरबर दिन-रात राजा की रखवाली करता और जो तनख्वाह पता, उससे वह पहले  ज़रूरतमंद लोगो को खाना खिलता और आखिर में जो कुछ बचता, उससे अपना  परिवार पालता।  बीरबर के इस दयालु स्वभाव की वजह से राजा आँखें बंद कर उस पर भरोसा करने लगा। 

एक रात, राजा अपने कमरे में चैन की नींद सो रहा था और बीरबर कमरे के बहार पहरा दे रहा था। तभी अचानक दूर कही से एक औरत के रोने की आवाज़ आने लगी।  राजा चौंक कर उठा | उसने बीरबर को बुलाया और आदेश दिया “बीरबर, पता लगाओ इतनी रात को कौन रो रहा है?”

बीरबर आवाज़ का पता लगाने निकल पड़ा। 

राजा को भी कुछ शक हुआ और वह भी बीरबर के पीछे पीछे चल पड़ा। 

आवाज़ का पीछा करते करते दोनों एक सुनसान मैदान में पहुँच गए।  मैदान में पहुंच कर राजा ने देखा की एक औरत सफ़ेद रंग की साड़ी पहन के तेज़ आवज़ में रो रही है। 

बीरबर औरत के पास गया और राजा पास में एक पेड़ के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगा। 

बीरबर ने पूछा “कौन हो तुम और रात में ऐसे सुनसान जगह पर क्यों रो रही हो?”

औरत ने कहा “मेरा नाम राजलक्ष्मी है, में राजा के महल में ही रहती हूँ। पर अब मुझे राजमहल छोड़ के जाना पड़ेगा और मेरे जाने से  महल में दुःख और गरीबी आएगी जिसके चलते राजा अपने प्राण त्याग देगा।  इसलिए में रो रही हूँ। 

यह सुन कर बीरबर बोला ” क्या कोई रास्ता है जिस से यह सब रोका जा सके और महाराज की जान बच सके? “

महालक्षी बोली ” यहाँ से एक कोस दूर एक देवी का मंदिर है, अगर तुम उस देवी के मंदिर में अपना सब कुछ दान दे दो और सब कुछ छोड़ के अपने परिवार के साथ अपनी पूरी ज़िन्दगी मंदिर की सेवा में लगाओ तो राजा का राज 100 साल चलेगा।”

यह सुन के बीरबर  लौट चला।  राजा भी छिपकर उसके पीछे पीछे चल पड़ा।  

घर पहुंच के बीरबर ने अपनी पत्नी को जगाया और उसे सारी बात बताई। 

बीरबर ने कहा “आज फ़र्ज़ पूरा करने का समय आ गया है।”

पत्नी बोली “मुझे आप के साथ चलने में कोई दिक्कत नहीं है, पर बच्चों का क्या होगा ? “

बीरबर के बच्चे भी आँख बंद किये यह सब सुन रहे थे।

अपनी माँ की बात  सुन वह चुप ना रह सके और उठ कर बोले ” हमे अपने माता पिता से बढ़कर कोई प्यारा नहीं है और हम आप के साथ सब कुछ छोड़ के मंदिर में रहने को तैयार हैं “

सब की मर्ज़ी जान कर बीरबर अपने परिवार के साथ नगर छोड़ के मंदिर में रहने चला गया। 

पर बीरबर का गुज़ारा वहां हो ना सका। मंदिर में खाने पीने की कमी होने की वजह से बीरबर और उसका परिवार कमज़ोर होता गया।  एक दिन बीमार पड़ने से उसके दोनों बच्चे और बीवी चल बसे।   

यह दुःख बीरबर से सहा ना गया।  वह अपने आप को कोसने लगा और अंत में मायूस हो कर उसने  भी अपने प्राण छोड़ दिए।

जब राजा रूपसेन को यह पता चला तो वह सब कुछ छोड़ के भगा भगा मंदिर की तरफ गया।  मंदिर पहुंच कर अपने सेवक की यह दशा देख  कर उससे रहा न गया और वह भी अपने प्राण लेने पर उतारू हो गया। 

पर तभी मंदिर की देवी प्रकट हुई और उन्होंने राजा को अपने प्राण लेने से रोक लिया। 

देवी बोली “राजन, तुम्हारा अपने सेवक के लिए ऐसा प्रेम देख कर मैं बहुत खुश हुई।  बताओ तुम्हे क्या वरदान चाहिए? “

राजा बोला “देवी, अगर आप सच में मुझे कुछ देना चाहती हैं तो बीरबर और उसके परिवार को फिर से जीवित कर दीजिये।  “

देवी ने आशीर्वाद दिया और बरिबर और उसका परिवार जी उठा। 

राजा बीरबर को नगर वापस ले गया और ख़ुशी ख़ुशी अपना राज पाठ सँभालने लगा। 

कहानी ख़त्म हुई और बेताल के सवाल पूछने की बारी आयी। 

बेताल बोला ” राजन इस कहानी में बीरबर, उसका परिवार, और राजा तीनो ही बहुत भले लोग थे।  पर इन में से सब से ज़्यादा बड़ा त्याग आप किसका मानेंगे?”

सवाल सुन के विक्रम बोले ” बीरबर और उसके परिवार का त्याग सच में बड़ा है, पर बीरबर ने अपना सब कुछ अपने कर्त्तव्य के लिए त्यागा जो उसका धर्म भी था। वहीँ राजा ने अपने प्राण अपने सेवक के लिए देने की  कोशिश करी जो सच में बड़ी बात है क्योंकि सेवक के लिए जान देना राजा का कर्त्तव्य नहीं था।  इसलिए राजा का त्याग ज़्यादा बड़ा हुआ।  “

और जवाब सुन बेताल फिर से पेड़ की तरफ उड़ गया। 

कहानी से सीख: एक सच्चा राजा वो होता है, जो अपनी प्रजा के लिए हमेशा खड़ा रहता है।

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Vikram Betal Story 4: वर कौन हुआ ?

एक समय की बात है , उज्जैन में एक हरिदास नाम का राजसेवक रहता था।

हरिदास की एक महादेवी नाम की बिटिया थी। जब बिटिया बड़ी हुई तो हरिदास को उसकी शादी की फ़िक्र सताने लगी।

एक दिन हरिदास ने महादेवी को बुलाया और पूछा  “बेटी तुम कैसे लड़के से शादी करना चाहोगी ? “

महादेवी ने कहा ” पिता जी आप जो लड़का मेरे लिए ठीक समझें, मैं उस से शादी करने को तैयार हूँ।  बस हो सके तो जो लड़का आप मेरे लिए ढूंढे, वह बहादुर ज़रूर हो।  “

कुछ दिनों बाद हरिदास को नगर के राजा ने  दरबार के काम से दूसरे राज्य में भेजा। 

हरिदास उस दूसरे राज्य के राजा के साथ घुलमिल गया। 

एक दिन हरिदास राज दरबार में बैठकर  कुछ चर्चा कर रहा था।  तभी एक नव युवक दरबार में आया।  युवक ने हरिदास की लड़की से शादी करने की इच्छा जताई। 

हरिदास ने कहा ” लड़की का हाथ उसी लड़के के हाथ में दूंगा जो सब से ज़्यादा गुनी होगा।”

युवक ने कहा ” मैं ऐसे रथ बनाने में माहिर हूँ जो एक क्षण में आप को दुनिया के किसी भी कोने में ले जा सकते हैं। “

हरिदास ने कहा “अच्छा, अगर ऐसा है तो कल सुबह तुम मुझे अपने रथ के साथ मिलो “

अगले दिन हरिदास उस लड़के से मिला और उसे उज्जैन चलने को बोला। रथ में सवार होने के बाद दोनों को उज्जैन पहुंचने में एक क्षण भी नहीं लगा। 

हरिदास खुश हो कर लड़के की शादी अपनी बेटी महादेवी से कराने को तैयार हो गया। 

परेशानी तब आई जब उज्जैन पहुंचने पर हरिदास को पता चला की महादेवी की माँ और उसका भाई पहले से ही एक-एक लड़का महादेवी से शादी कराने को ढूंढ चुके हैं। अब सवाल यह उठा  की तीनो में से महादेवी के लिए सब से योग्य वर कौन है?

तभी अचनाक, उस रात नगर के बहार वाली पहाड़ी से आकर एक राक्षस महादेवी को उठा ले गया। सुबह जब महादेवी के गायब होने की खबर  पता चली तो घर में  कोहराम मच गया। 

जिस लड़के को महादेवी के भाई ने पसंद किया था, उसने अपनी विद्या का इस्तेमाल करके पता लगाया की महादेवी कहाँ है। 

महादेवी का पता चलने के बाद जब बारी आई उस तक पहुंचने की, तो हरिदास के ढूंढे लड़के का रथ काम आया। 

और आखिर में महादेवी की माँ के ढूंढे हुए लड़के ने राक्षस से लड़ के महादेवी को बचा लिया। 

पर महादेवी के वापस आते ही फिर यह प्रश्न उठा – आखिर इन तीनों में सबसे योग्य वर कौन है?

कहानी ख़तम कर बेताल ने पूछा “क्या आप बता सकते हैं विक्रम? “

इस पर विक्रम ने कहा “यह सच है की महादेवी का पता लगाने वाले और उस तक रथ से पहुंचाने वाले लड़कों ने बहुत मदद की, पर जिस लड़के ने महादेवी के लिए राक्षस से लड़ाई की वह सही मायने में वैसा बहादुर लड़का है जैसा महादेवी अपने लिए चाहती थी। “

यह सुन के बेताल फिर अपने पेड़ की तरफ उड़ चला। 

कहानी से सीख: मुश्किल समय में साहस ही काम आता है

Vikram Betal Story 5: पति पत्नी कौन ?

बहुत समय पहले , धर्मपुर नगर में धर्मशील नाम का एक राजा रहता था।  अपनी कोई संतान ना होने की वजह से राजा बहुत दुखी था।

एक दिन राजा के एक मंत्री ने सुझाव दिया ” महाराज, आप एक देवी मंदिर क्यों नहीं बनवा के देखते ? शास्त्रों में इसका बड़ा गुणगान है।  अगर देवी माँ ने चाहा तो आपकी अपनी संतान ज़रूर होगी।  “

राजा धर्मशील को मंत्री का सुझाव पसंद आया। उसने एक विशाल मंदिर बनवाया और उसमे देवी की मूर्ति की स्थापना करवाई। अब राजा मंदिर में पूजा किये बिना पानी तक नहीं पीता था।

राजा की भक्ति देख देवी सच में उस पर प्रसन्न हुई और एक दिन प्रकट हो कर बोलीं “राजन मैं तुमसे बहुत खुश हूँ। कहो तुम्हे क्या वरदान चाहिए ? “

राजा ने कहा “हे देवी ,आप की कृपा से मेरे पास सब कुछ है , बस अपनी कोई संतान नहीं है। अगर आप आशीर्वाद दें, तो मेरे घर में भी एक संतान का जन्म हो। “

“ऐसा ही होगा” कह कर देवी ओझल हो गयीं। 

देवी के आशीर्वाद से राजा धर्मशील के घर एक संतान ने जन्म लिया।  इस चमत्कार से मंदिर दूर दूर तक प्रसिद्द हो गया। 

कुछ दिन बाद , दूर किसी नगर से एक युवक धर्मपुर में आया। देवी मंदिर की कीर्ति सुन वह खुद को मंदिर आकर दर्शन करने से रोक नहीं पाया था। उसी अवसर, नगर के एक धोबी की लड़की भी मंदिर दर्शन के लिए आयी।  युवक को उस लड़की को देखते ही प्यार हो गया और उसे हासिल करने के लिए देवी से मन्नत मांगने लगा। 

अपने नगर वापस आकर के लड़के ने अपने पिता से धर्मपुर चल उसी लड़की के साथ शादी करवाने की इच्छा जताई। 

लड़के के पिता ने धर्मपुर आकर दोनों की शादी धूम धाम से करवा दी।

कुछ समय बीता, वही लड़का अपनी पत्नी और एक दोस्त के साथ फिर धर्मपुर से गुज़रा। धर्मपुर आ कर उसे अपनी मन्नत याद आयी और वह देवी दर्शन के लिए मंदिर की तरफ चल दिया। 

बदकिस्मती से, मंदिर की सीढ़ी चढ़ते हुए लड़के का पैर फिसला गया और वह ज़मीन पे जा गिरा। गंभीर चोट आने की वजह से वही उसके प्राण निकल गए। 

बहुत देर बाद लड़के का दोस्त उसे ढूंढ़ते हुए मंदिर आया। अपने दोस्त को मरा हुआ देख वह रह नहीं पाया और उसने भी अपने प्राण छोड़ दिए। 

जब यह खबर लड़के की पत्नी तक पहुंची तो वह मंदिर आयी और देवी से प्रार्थना कर के बोली “हे माँ , जब आप ने मेरे पति और देवर दोनों के प्राण हर लिए तो अब में भी ज़िंदा रह कर क्या करुँगी ? कृप्या मेरे भी प्राण ले लीजिये।” और ऐसा कह के वह वहीँ रोने लगी। 

तभी देवी प्रकट हुई और बोलीं ” बेटी में तुम्हारा दुःख समझती हूँ और जीवन भर की तुम्हारी भक्ति के लिए तुम्हें मनचाहा वरदान देना चाहती हूँ।  मांगो जो मांगना चाहती हो।”

लड़की बोली “आप मेरे पति और देवर को जीवन दीजिये। “

देवी बोलीं ” ऐसा ही होगा, में तुम्हे एक मंत्र दूंगी, जिसका जाप करने से तुम्हारे पति और देवर फिर से जी उठेंगे। “

मंत्र देकर देवी गायब हो गई। 

लड़की ने अपने पति और देवर को फिर से ज़िंदा करने के उत्साह में मंत्र जपने में गलती कर दी। 

उसका नतीजा यह हुआ की उसके पति और देवर के दिमाग आपस में बदल गए।  अब लड़की के पति के शरीर में लड़की के देवर का दिमाग था और देवर के शरीर में पति का दिमाग था । 

कहानी ख़तम कर बेताल बोला “क्या आप बता सकते हैं विक्रम, इस स्थिति में लड़की का पति किसे मना जायेगा?”

विक्रम ने थोड़ा सोचा और कहा “असल में हमे अपने और दूसरों के होने का एहसास इस दिमाग की वजह से होता है, इसलिए सही मायने में लड़की का पति वही हुआ जिस शरीर में पति का दिमाग है। “

सही जवाब सुन कर बेताल फिर अपने पेड़ की तरफ उड़ गया ।

कहानी से सीख: इंसान सब कुछ अपने मस्तिष्क से ही करता है।

Vikram Betal Story 6: किसका उपकार बड़ा ?

एक समय की बात है , मिथिलावती नाम के नगर में गुणधिप नाम का एक राजा राज करता था। राजा दूसरों का भला करने के लिए दूर-दूर तक जाना जाता था।

एक बार दूर किसी देश से चिरमदेव नाम का एक युवक राजा गुणधिप से मिलने पहुंचा। चिरमदेव रोज़ राजा से मिलने उसके दरबार जाया करता लेकिन राजा अपने काम काज में इतना व्यस्त रहता था की चिरमदेव से मिल ही नहीं पाता था । 

एक दिन राजा शिकार खेलने जंगल की तरफ गया।  चिरमदेव मौका देख के राजा की सवारी के पीछे पीछे निकल पड़ा। घने जंगल में जा कर राजा अपनी सेना से अलग हो गया।  लेकिन चिरमदेव अभी भी राजा के पीछे ही चल रहा था।  राजा को अकेला और परेशान देखकर वह उसके  पास गया और उसे दिलासा देने लगा 

कुछ देर बाद राजा को भूख लगी। पर इस घने जंगल में खाना मिलना मुश्किल था। थोड़ी मेहनत करने के बाद चिरमदेव किसी तरह राजा के खाने  के लिए कुछ ढूंढ  ही लाया।  उसके बाद दोनों नगर की तरफ वापस चल दिए। 

राजा चिरमदेव से बहुत खुश था इसलिए राजा ने चिरमदेव को अपने दरबार मे नौकरी दे दी। 

एक बार राजा ने चिरमदेव को किसी काम से समुद्र किनारे भेजा। वहाँ पहुंच कर चिरमदेव को एक मंदिर दिखाई दिया तो उसने दर्शन करने की सोची। मंदिर के आँगन में प्रवेश करते ही चिरमदेव को एक सुन्दर युवती मिली जिसे देखते ही उसे प्यार हो गया। 

चिरमदेव ने युवती से कहा ” मैं मिथिलावती के दरबार में राज सेवक हूँ। क्या तुम मुझ से शादी करोगी ? “

जवाब देने से पहले युवती ने चिरमदेव को मंदिर के बहार वाले तालाब में स्नान कर के आने को कहा।

चिरमदेव तालाब में स्नान करने गया पर वह एक जादुई तालाब था। जैसे ही चिरमदेव डुबकी लगा कर बहार आया तो उसने आपने आप को वापिस अपने नगर मिथिलावती में पाया।

चिरमदेव  को कुछ समझ नहीं आया और उसने जाकर सारी आप बीती राजा को सुनाई | राजा सुनते ही चिरमदेव की मदद करने को तैयार हो गया। दोनों अपने अपने घोड़े पर सवार होकर कर समुद्र किनारे वाले मंदिर की  तरफ निकल पड़े।

मंदिर पहुंचने पर उन्हें वह युवती उन्हें फिर दिखाई दी। पर इस बार वह युवती राजा गुणधिप के पास आकर बोली ” महाराज, में आप को देख कर बहुत प्रसन्न हुई। आप जो आदेश देंगे में उसे मानने को तैयार हूँ।  “

यह सुन कर राजा ने युवती को आदेश दिया की वह चिरमदेव से शादी कर ले। राजा की आज्ञा मान युवती ने चिरमदेव से शादी कर ली ।

अब कहानी ख़तम कर बेताल ने विक्रम से पूछा “कहिये विक्रम, इस कहानी में किस का उपकार ज़्यादा बड़ा माना जाए, राजा का या उसके सेवक का ?”

विक्रम ने कहा “राजा ने निसंदेह अपने सेवक की शादी उसकी पसंद की लड़की से करा कर उस पर उपकार किया था, पर जंगल में राजा की जान बचा कर जो उपकार सेवक ने किया वह ज़्यादा बड़ा माना जायेगा।  “

उत्तर सुन कर बेताल फिर से अपने पेड़ की तरफ उड़ गया।

कहानी से सीख:अपने वादे से इंसान को कभी नहीं मुकरना चाहिए।

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Vikram Betal Story 7: किसका बलिदान बड़ा ?

बहुत समय पहले हिमालय पर्वत पर गन्धर्व नगर राज्य में जीमुतकेतु नाम का एक राजा था। जीमुतकेतु अपनी कोई संतान ना होने की वजह से काफी परेशान था।  तब राजा को उसके मुख्यमंत्री ने कल्पवृक्ष की पूजा करने को कहा। एक दिन वृक्ष देवता खुश हुए और उन्होंने जीमुतकेतु  को दर्शन दिए। जीमुतकेतु ने वृक्ष देवता से एक राजकुमार का वरदान माँगा। 

कुछ समय बाद जीमुतकेतु के घर एक राजकुमार का जन्म हुआ। उसका नाम जिमुतवाहन रखा गया।  राजकुमार आगे चल के बहुत दयालु और होनहार निकला।   जिमुतवाहन भी पूरे मन से अपने पिता की तरह कल्पवृक्ष की पूजा करता था। एक दिन वृक्ष देवता उस से खुश हुए और उसे भी वरदान मांगने को कहा । जिमुतवाहन ने देवता से अपने पूरे राज्य की गरीबी मिटाने का वरदान माँगा। 

ऐसा ही हुआ। अब गन्धर्व नगर में कोई गरीब नहीं था। गरीबी ना रहने की वजह से अब राज्य में सेवक मिलने बंद हो गए।  इससे नाराज राजा के भाई बंधु राजा के खिलाफ ही षड़यंत्र रचने लगे।  एक दिन मौका देख के राजा के भाइयों ने राजा और उसके बेटे को घेर लिया।  जिमुतवाहन के समझाने पर जीमुतकेतु बिना युद्ध किये अपना राज-पाठ अपने भाइयों को देकर, जिमुतवाहन के साथ पर्वत के ऊपर  एकांत में रहने चला गया। 

एक बार जिमुतवाहन पूजा करने मंदिर की तरफ गया। मंदिर में उसे मलयकेतु राजा की पुत्री भजन गाती सुनाई दी। जिमुतवाहन को उसे देखते ही प्यार हो गया। राजकुमारी की भी नज़र जिमुतवाहन पर गई और वह भी उससे आकर्षित हुई। पर शर्म के मारे, दोनों एक दूसरे से कुछ कह ना सके। कुछ देर बाद राजकुमारी अपने महल चली गयी।  जिमुतवाहन ने राजकुमारी की सखी से पूछा तो पता चला की उसका नाम मलयवती था। 

महल पहुँच कर मलयवती ने अपनी माँ को सारा हाल कह सुनाया।  मलयवती की माँ ने महाराज को जिमुतवाहन के बारे में बताया। महाराज मलयकेतु ख़ुशी ख़ुशी दोनों की शादी करने को तैयार हो गए।  इस तरह जिमुतवाहन और मलयवती एक दूसरे के साथ रहने लगे। 

एक दिन , जिमुतवाहन सुबह सवेरे पूजा करने मंदिर की तरफ गया।  रास्ते में उसे सफ़ेद रंग का ढेर पड़ा दिखाई दिया और पास से एक बुजुर्ग महिला के रोने की आवाज़ सुनाई दी।  जीमुतवहन ने उस महिला से पूछा “काकी, आप क्यों रो रही हैं?”

उस पर महिला ने कहा “बेटा, यहाँ एक राक्षस हमारे गाँव के लड़को को रोज़ खाने आता है। आज मेरे बेटे शंकचूड़ की बारी है, वह उसे खाने आता ही होगा। “

यह सुन कर जिमुतवाहन का दिल करुणा से भर उठा। 

जिमुतवाहन ने देखा शंकचूड़ वहां आ गया था।  जिमुतवाहन ने शंकचूड़ से कहा की आज शंकचूड़ की जगह वह राक्षस का सामना करेगा। शंकचूड़ ना माना और उसने कहा की उस जैसे आम आदमी की जान एक राजकुमार की जान के आगे कोई मायने नहीं रखती।

जिमुतवाहन पीछे हटने को तैयार ना हुआ। राक्षस वहाँ आ पंहुचा और  दोनों के बीच कड़ा मुक़ाबला शुरू हो गया। आखरी में राक्षस जिमुतवाहन को अपने हाथ में दबा के आसमान में ले उड़ा।

इतनी देर में मलयवती भी जिमुतवाहन को ढूंढ़ते ढूंढ़ते वहां आ पहुंची। अपने पति की जान खतरे में देख वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। 

शंखचूड़ से यह सब देखा न गया।  उसने राक्षस को आवज़ देकर बता दिया की जीमुतवहन एक राजकुमार है, और उसका असली भोजन शंकचूड़ है। 

राक्षस जिमुतवाहन के इस बलिदान से बेहद हैरान हुआ।  उसने  कहा ” हे राजकुमार, तुम जैसा दयालु मैंने आज तक नहीं देखा , में तुमसे बहुत खुश हूँ और  मुझसे कोई भी वरदान मांग सकते हो। 

राजकुमार बोला “अगर तुम सच में मुझे कुछ देना चाहता है तो इस गाँव के बच्चों को अपना भोजन बनाना छोड़ दो।  “

राक्षस जिमुतवाहन  की बात मान कर वहां से हमेशा के लिए चला गया। 

जब जीमुतकेतु के भाइयों को यह पता चला तो उन्होंने भी सारा राज-पाठ वापस कर दिया। 

यह कहानी सुना कर बेताल बोला  “बताइये विक्रम , इसमें ज़्यादा बड़ा बलिदान किस का हुआ ? जिमुतवाहन का या शंकचूड़ का?”

विक्रम बोले ” जिमुतवाहन का बलिदान सच में महान था, पर शंकचूड़ का बलिदान ज़्यादा बड़ा माना जायेगा क्योंकि क्षत्रिय राजा का यह फ़र्ज़ होता है की वह अपनी प्रजा की रक्षा करे, जो जीमूतवाहन ने किया। पर शंकचूड़ ज़िंदा बचने के बाद फिर से वापस आया और उसने राजकुमार को बचाने  के लिए अपने प्राण दाव पे लगाए। इसलिए शंकचूड़ का बलिदान ज़्यादा बड़ा बनता है। “

यह सुन कर बेताल फिर से पेड़ की तरफ वापिस उड़ गया।

कहानी से सीख: इंसान सब कुछ अपने मस्तिष्क से ही करता है।

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Vikram Betal Story 8: सबसे सिक्षित कौन ?

जयस्थल नाम के एक नगर में विष्णुशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था।  विष्णुशर्मा के चार बेटे थे जिन्हें उसने बहुत प्यार से पाल पोस  कर बड़ा किया था। 

चारों बेटे समय आने पर शिक्षा प्राप्त करने दूर किसी नगर में चले गए। कई महीनों तक कड़ी मेहनत करके चारों ने शिक्षा प्राप्त की।  अंत में वह चरों अपनी अपनी शिक्षा पूर्ण कर के अपने गुरु से मिले। गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा की जो कुछ भी तुमनें यहाँ सीखा है उसका हमेशा सदुपयोग करना। जब भी कोई मुश्किल आन पड़े तो सीखी हुई विद्या के इलावा हमेशा अपने दिमाग का भी इस्तेमाल करना। चारों भाई फिर गुरु को प्रणाम कर अपने घर की तरफ वापस चल दिए। 

उनके रास्ते में एक जंगल पड़ता था।  जंगल से गुजरते हुए चारों भाइयों को एक मारा हुआ शेर दिखाई दिया। उसे देख के तीन भाइयों को अपनी शिक्षा को आज़माने का मन हुआ।  हालाँकि चौथा और सब से छोटा भाई इसके लिए तैयार नहीं था।  उसने अपने तीनों भाइयों को रोकने की बहुत कोशिश की पर उन्होंने उसकी एक न सुनी  और उसे डरपोक कह करके, वहां से भाग जाने को कहा।  

सब से बड़े भाई ने शेर की हड्डियां इकठी की और सही तरीके से लगा दी। 

दूसरे भाई ने उन हडियों पर पास में पड़ी शेर की खाल चढ़ाई।

और जैसे ही तीसरा भाई मंत्र पढ़ के शेर में जान डालने को हुआ, फिर से सबसे छोटे भाई ने उन्हें रोकने की कोशिश करी । पर घमंड में तीनों बड़े भाइयों ने उसकी एक ना सुनी।

हार कर सब से छोटा भाई पास के एक ऊँचे से पेड़ के ऊपर चढ़ गया। 

फिर तीसरे  भाई ने अपनी शिक्षा से उस शेर में जान दाल दी।  जैसे ही शेर में प्राण आये, तो उसे बहुत तेज़ भूख लगी और वह शेर तीनों भाइयों को तुरंत ही खा गया।  छोटा भाई मजबूर हो कर यह सारा मंजर पेड़ पर से दुखी  मन से देखता रहा। 

अब बेताल ने पूछा “बताइये राजन , इन चारों भाइयों में से सब से ज़्यादा शिक्षित कौन था?”

विकरम ने उत्तर दिया “सब से शिक्षित भाई वही था, जिसने अपने बेवकूफ भाइयों को शेर में जान डालने से रोका। शिक्षा का महत्व तब है जब आप में  सामान्य ज्ञान हो। बाकी तीनो भाई अपने ज्ञान के घमंड में इतने मतवाले हो गए की यही नहीं सोच पाए की तब क्या होगा जब शेर में प्राण आ जायेंगे। “

इतना सुनते ही बेताल एक बार फिर से अपने पेड़ की तरफ उड़ गया। 

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Vikram Betal Story 9: चोर हँसा क्यों और रोया क्यों ?

चन्द्रहृदय नाम की नगरी में रणधीर नाम का राजा राज करता था। अचानक एक दिन उस नगरी में चोरी होने लगी।  सभी नगरवासी राजा के पास अपनी परेशानी लेकर गए।  राजा ने सभी को भरोसा दिलाया की वह आगे किसी को चोरों की वजह से परेशान नहीं होने देगा।

राजा रणधीर ने बहुत से पहरेदार पूरे शहर में लगा दिए। पर चोरियां होनी फिर भी बंद ना हुईं।  तब राजा ने चोरों को पकड़ने के लिए खुद ही पहरेदार का भेष धारण करने की ठानी।

रात होते ही वह खुद ढाल तलवार लिए पहरेदारों की तरह नगर की रक्षा करने निकल गया। राजा की तरकीब काम आयी।  रास्ते में उसे चोर मिला।  चोर ने राजा से पूछा की वह कौन है ? राजा ने चोर से झूठ बोला की वह भी एक चोर ही है। 

चोर ख़ुशी ख़ुशी राजा को अपने साथ चोरी करने ले गया।  चोरी करने के बाद सारा धन लेकर चोर और राजा नगर के बहार एक कुएं के पास पहुंचे।  वह कुआँ ही चोर का ठिकाना था जहाँ चोर सारा चोरी का सामन छिपाता था। 

जितनी देर में चोर सामान छिपाने अंदर गया, उतनी देर में चोर की एक दासी वहां से निकली।  वह राजा को देखते ही पहचान गयी और बोली – ” आप यहाँ क्या करने आये हैं महाराज? जितना जल्दी हो सके यहाँ से चले जाइये वरना यह दुष्ट आप को मार देगा।”

राजा रणधीर उस समय  वहां से भाग निकला और अगले  दिन अपनी पूरी सेना के साथ वापिस आया। सेना ने चोर का कुआँ घेर लिया। चोरों की टोली और राजा की सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ।  जब राजा ने देखा की उसकी सेना हार रही है, तो वह भी किसी तरह अपनी जान बचाने के लिए भागा। चोर ने राजा का मज़ाक उड़ाते हुए कहा – ” राजा हो कर लड़ाई से भागते हो? शर्म आनी चाहिए।  “

यह सुन के राजा रुक गया।  राजा और चोर एक दूसरे से युद्ध करने लगे।  आखरी में चोर हार गया और राजा उसे पकड़ कर नगर ले आया। राजा ने चोर को इतने लोगों के घर चोरियां करने की सज़ा में मृत्युदंड दिया। 

नगर में धर्मध्वज नाम का एक धनवान सेठ भी रहता था।  सेठ की बेटी शोभिनी अभी अभी शादी के लायक हुई थी। जब चोर को दंड देने के लिए नगर के बीचों बीच लाया जा रहा था, तभी शोभिनी और चोर ने एक दूसरे को देखा और शोभिनी को चोर से प्यार हो गया। 

शोभिनी ने अपने पिता से कहा – ” पिताजी आप किसी तरह इसे राजा से छुड़ा लाइए।  यह दुबारा कभी चोरी नहीं करेगा। “

धर्मध्वज जनता था की अब कुछ नहीं हो सकता, पर फिर भी वह अपनी बेटी की बात मान के एक बार राजा से बात करने गया।  राजा ने सेठ की एक न सुनी और निश्चित समय पर चोर को नगर के बीच में दंड देने के लिए खड़ा कर दिया गया।   

इतने में शोभिनी वहां आयी और बोली ” अगर इस चोर को मृत्युदंड मिला, तो में भी अपने प्राण दे दूंगी। “

यह देख कर चोर पहले तो ज़ोर से हंसा और फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। 

इस तरह कहानी ख़तम कर बेताल ने विक्रम से पूछा – ” तो बताइये विक्रम, की चोर हँसा क्यों और रोया क्यों था ?”

विक्रम ने जवाब दिया – “चोर इसलिए हँसा क्योंकि इतनी अच्छे और धनवान सेठ की बेटी हो कर शोभिनी उस जैसे चोर से प्यार कर बैठी।  और चोर रोया इसलिए क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी थी।  अगर इतनी अच्छी लड़की उसे पहले मिलती, तो वह चोरी चकारी करके अपनी ज़िन्दगी बर्बाद ही ना करता।”

यह सुन कर बेताल फिर अपने पेड़ की तरफ उड़ गया ।

कहानी से सीख: प्यार में बड़ी ताकत होती है।

Vikram Betal Story 10: चतुर कौन हुआ ?

एक समय की बात है, धर्मपुर नगर में गोविन्द नाम का एक ब्राह्मण रहता था।  गोविन्द के दो बेटे थे – हरिदत्त और  सोमदत्त।

एक दिन गोविन्द ने एक यज्ञ करवाना चाहा।  यज्ञ के लिए उसे एक कछुए की ज़रूरत थी और पंडित के कहे अनुसार जो कोई भी इस कार्य को सिद्ध करेगा, बहुत ही धनवान बन जायेगा। 

यह सुनते ही कछुआ लाने की ज़िद्द दोनों लड़के ही करने लगे।  हरिदत्त ने कहा की क्यूंकि वह बड़ा है, यह उसका हक़ बनता है।  पर सोमदत्त बोला की वह क़ाबलियत में हरिदत्त से किसी तरह भी काम नहीं, इसलिए वही जायेगा।   

बात जब ज़्यादा आगे बढ़ी तो निर्णय लेने के लिए गोविन्द ने राजा के पास जाना ही ठीक समझा।  

सारी  बात बताने के बाद गोविन्द ने राजा से कहा “आप ही बताये महाराज किसे कछुआ लाने भेजा जाये? “

तब राजा ने दोनों लड़को की ओर देखा और कहा  “तुम दोनों एक एक कर के मुझे अपनी काबिलियत बताओ।  तब में निर्णय लूंगा की कौन सब से चतुर है और कछुआ लाने योग्य है। “

सब से पहले, हरिदत्त बोला – “महाराज मेरी योग्यता यह है की में खाना सूंघ के यह पता लगा सकता हूँ की इसका अनाज किस खेत से आया है।  “

यह  सुन कर राजा ने अपनी रसोई से कुछ चावल मंगवाए और हरिदत्त को खाने को दिए। लेकिन हरिदत्त ने उन्हें  मुँह के पास न आने दिया।  ऐसा करने की वजह पूछने पर हरिदत्त ने बोला “महाराज यह चावल किसी खेत के नहीं हैं, बल्कि एक कूड़ा डालने के मैदान में उगाये गए हैं। “

यह सुन कर राजा ने रसोइये को बुलवाया और उससे  पूछा की यह चावल कहाँ से आये हैं  तो रसोइये ने कहा “महाराज यह चावल शिवपुर नाम के एक गाँव के पास बहुत बड़ा कूड़े का मैदान है, वहां उगाये गए थे। “

राजा बहुत हैरान हुआ। 

अब राजा ने सोमदत्त से पूछा – “तुम बताओ तुम किस चीज़ में माहिर हो?”

सोमदत्त बोला ” महाराज, मेरी योग्यता यह है की मैं बिस्तर परख के बता सकता हूँ की यह सोने लायक है या नहीं। “

यह सुन के राजा ने सोमदत्त के लिए एक बिस्तर मंगाया।  सोमदत्त उसपे लेटते ही उठ खड़ा हुआ। जब राजा ने ऐसा करने की वजह पूछी तो सोमदत्त बोला –

“महाराज, इस बिस्तर की सातवीं परत में एक काँटा है जिसके हलके हलके चुभने से नींद में परेशानी रहेगी।”

राजा ने बिस्तर की परत हटवाई , सच में सातवीं परत में एक काँटा था। 

राजा फिर हैरान हुआ। 

राजा के लिए यह निर्णय लेना मुश्किल हो गया की  सच में कौन ज़्यादा चतुर है। 

तब बेताल बोला ” विक्रम क्या आप बता सकते हैं की दोनों में से ज़्यादा चतुर कौन हुआ?”

आज पहली बार विक्रम को जवाब नहीं पता था और वह बिलकुल चुप रहा।   

बेताल राजा विक्रम की ईमानदारी से बहुत खुश हुआ और विक्रम के साथ ख़ुशी ख़ुशी साधू के पास चलने को तैयार हो गया। और इस तरह से राजा विक्रम ने साधु से किये अपने वादे को पूर्ण किया।

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